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US: पालक पनीर की खुशबू पर विवाद, अमेरिकी यूनिवर्सिटी के खिलाफ भारतीय छात्रों की जीत; मिला इतने करोड़ का मुआवजा

Thu, 15 Jan 2026 01:29 AM IST
हिमांशु चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन

सार

अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में पालक पनीर की खुशबू से शुरू हुआ विवाद अब भेदभाव के खिलाफ बड़ी कानूनी जीत बन गया। दो भारतीय छात्रों ने नस्लीय उत्पीड़न और प्रतिशोध के आरोप लगाए, जिसके बाद उन्हें 1.8 करोड़ रुपये का समझौता मिला। आइए इस पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
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पालक पनीर - फोटो : एआई
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विस्तार
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अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव का एक मामला अब अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। भारतीय पीएचडी छात्र आदित्य प्रकाश और उर्मि भट्टाचार्य ने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो बोल्डर के खिलाफ नस्लीय भेदभाव और प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए कानूनी लड़ाई लड़ी। यह मामला एक साधारण से दिखने वाले लंच विवाद से शुरू हुआ, लेकिन आखिरकार 1.8 करोड़ रुपये के नागरिक अधिकार समझौते पर जाकर खत्म हुआ।

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यह पूरा मामला सितंबर 2023 का है, जब आदित्य प्रकाश ने यूनिवर्सिटी के विभागीय किचन में माइक्रोवेव में अपना खाना गर्म किया। बताया गया कि उस दिन उनके खाने में पालक पनीर था। इसी दौरान एक स्टाफ सदस्य ने कथित तौर पर खाने की खुशबू को लेकर शिकायत करते हुए उनसे माइक्रोवेव का इस्तेमाल न करने को कहा। आदित्य ने जवाब दिया कि यह सिर्फ खाना है, वह उसे गर्म कर रहे हैं और तुरंत चले जाएंगे। यहीं से विवाद ने तूल पकड़ लिया।

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भेदभाव और प्रतिशोध के आरोप
आदित्य और उर्मि का कहना है कि इस घटना के बाद हालात तेजी से बिगड़ते चले गए। आदित्य को बार-बार वरिष्ठ फैकल्टी के सामने बुलाया गया और कहा गया कि उनकी वजह से स्टाफ “असुरक्षित” महसूस कर रहा है। वहीं उर्मि भट्टाचार्य को बिना किसी स्पष्ट कारण के अपनी टीचिंग असिस्टेंट की नौकरी से हटा दिया गया। उर्मि का आरोप है कि उन्हें दो दिन लगातार भारतीय खाना खाने के बाद “दंगा भड़काने” जैसे गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा।

किचन नियमों पर भी उठे सवाल
छात्रों ने अपने मुकदमे में यह भी कहा कि विभागीय किचन के नियम खासतौर पर दक्षिण एशियाई समुदाय को निशाना बनाते हैं। उनका दावा था कि इन नियमों के कारण भारतीय और अन्य एशियाई छात्रों को साझा जगहों पर अपना खाना खोलने से हतोत्साहित किया जाता है। यह रवैया सीधे तौर पर नस्लीय भेदभाव की श्रेणी में आता है।

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कानूनी लड़ाई और समझौते के अहम बिंदु

  • दो साल तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद सितंबर 2025 में यूनिवर्सिटी ने समझौते पर सहमति जताई।
  • दोनों छात्रों को कुल 1.8 करोड़ रुपये (दो लाख डॉलर) का भुगतान किया गया।
  • आदित्य और उर्मि को मास्टर डिग्री प्रदान की गई।
  • हालांकि, उन्हें भविष्य में यूनिवर्सिटी में पढ़ाई या नौकरी से वंचित कर दिया गया।
  • यूनिवर्सिटी ने किसी भी तरह की कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की।


भारत वापसी और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
समझौते के बाद यह दंपत्ती भारत लौट आया। उर्मि भट्टाचार्य ने इंस्टाग्राम पर अपनी पीड़ा साझा करते हुए लिखा कि यह लड़ाई सिर्फ खाने की आजादी की नहीं थी, बल्कि सम्मान और आत्मसम्मान की भी थी। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्हें मानसिक और शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन वह अन्याय के सामने झुकने वाली नहीं हैं। सोशल मीडिया पर इस फैसले का जोरदार स्वागत हुआ। कई लोगों ने इसे सही तरीके से आवाज उठाने की मिसाल बताया, तो कुछ ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वे इस जीत का जश्न और ज्यादा पालक पनीर खाकर मनाएंगे।


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