कोरोना के पाजिटिव मामले पाकिस्तानी हुक्मरानों और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाने के बाद अब वहां हड़कंप मचा है और सुप्रीम कोर्ट को भी लगने लगा है कि इमरान सरकार इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि इस हेल्थ इमरजेंसी को सरकार बेहद गंभीरता से ले और देश के सभी प्रांतों के लिए एक समान नीति और नजरिया अपनाए।
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस गुलजार अहमद ने सरकार को निर्देश दिया है कि स्वास्थ्य देश के नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हिस्सा है और इसके लिए हर तरह के जरूरी प्रशासनिक कदम उठाए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद से वह इसकी गंभीरता को बेहद करीब से देख रहे हैं। कोर्ट से स्वत
: संज्ञान लेते हुए इस मामलो को गंभीरता से लिया है।
कोर्ट के पांच सदस्यीय बेंच में चार ही जज मौजूद थे और सोशल डिटेंसिंग का पूरा ख्याल रख कर मामले पर सुनवाई कर रहे थे।
चीफ जस्टिस अहमद ने कहा कि सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि इसकी गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए सरकार ने इतने दिनों में इस महामारी को लेकर कोई भी ऐसा कानून नहीं बनाया जिसमें राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखा जा सके।
हम शुरू से ऐसे कानून की वकालत कर रहे हैं जो देश के सभी प्रांतों पर समान रूप से लागू हो सकें। ईद के मद्देनजर शनिवार और इतवार को भी दुकानें खोलने को लेकर 15 मई को दिए गए अपने निर्देशों को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि अब मौजूदा स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय कानून बनाए और सख्ती से लागू करे।
ऐसे किसी कानून को लेकर किसी भी प्रांत को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह राष्ट्रीय इमरजेंसी के हालात हैं जब देश में एक लाख से ज्यादा लोग इस महामारी के शिकार हैं। ऐसे में केंद्र सरकार को यह कदम उठाना ही चाहिए क्योंकि महामारी इंसानों में फर्क नहीं करती।
उधर पाकिस्तान के अटॉर्नी जनरल खालिद जवाद खान ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि अभी तक सरकार ने इस महामारी से लड़ने और इसके संक्रमण को रोकने केलिए हर संभव कोशिशें की हैं और लगातार कर रही है।
उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि वह सरकारी निर्देशों को जमीनी स्तर पर लागू करने को लेकर आदेश जारी करे।
सुप्रीम कोर्ट ने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां सरकार ने वायरस को फैलने से रोकने के लिए शुरू में ही राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाया और उसका सख्ती से पालन कराया।
लेकिन पाकिस्तान सरकार प्रशासनिक स्तर पर पूरी तरह नाकाम रही है। चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रशासनिक आदेश और संवैधानिक मामलों में फर्क होता है।
उन्होंने पूछा कि आखिर सरकार खुले दिल से सबके साथ बैठकर इस समस्या का समाधान क्यों नहीं निकालना चाहती और क्यों कोई राष्ट्रीय कानून बनाने से बच रही है।