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जिस लम्हे मलाला को गोली मारी गई...

Sat, 10 Nov 2012 03:30 PM IST
बीबीसी हिंदी/शायमा ख़लील
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हमलावरों की गोली जिस वक्त मलाला यूसुफजई के सिर को चीरकर अंदर घुसी उस वक्त पास की सीट पर ही उनकी दोस्त कायनात रियाज भी बैठीं थीं।
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बंदूक़धारियों ने बस में प्रवेश किया, मलाला की पहचान की और लगे गोलियां चलाने। उनमें से एक गोली ने कायनात के हाथ को बुरी तरह से घायल कर दिया। हमले में कायनात के अलावा एक तीसरी लड़की भी घायल हुई थी।

पिछले महीने हुए हादसे के उन लम्हों को याद करती हुई कायनात कहती हैं, 'बिल्कुल अफ़रा-तफ़री का माहौल था।'
और आज भी जब वो उन क्षणों को याद करती हैं तो ख़ौफ़ और दहशत से घिर जाती हैं।

चीख-पुकार
"पहले तो जब वो (बंदूक़धारी) बस में घुसा और पूछने लगा मलाला कहां है, कौन है मलाला? तो हमें लगा कोई यूं ही मज़ाक कर रहा है। लेकिन जैसे ही मलाला की जबान से ये अल्फ़ाज़ निकले कि क्या है मैं ही मलाला हूं, उसने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। एक गोली मलाला को लगी और वो गिर पड़ी।"
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कायनात के अनुसार, 'वैसे भी मलाला को पहचानना कोई मुश्किल नहीं था। हम सब हिजाब का इस्तेमाल करते थे लेकिन उसने हमेशा से परदे से इंकार किया था।"

वह बताती हैं, "जिस वक़्त मलाला नीचे गिरी तब तक वो शख्स बस में ही मौजूद था। गोली मेरे हाथ को भी भेद चुकी थी। सब कुछ इतने अचानक से हुआ था और माहौल कुछ ऐसा था, सब इस क़दर ख़ौफ़ज़दा थे कि कुछ समझ में नहीं आ रहा था। हर कोई रो रहा था। चीख़ो पुकार मची थी बस में।"

मलाला की दोस्त ने उस वक्त को याद करते हुए कहा, "बस के ड्राइवर को शायद अंदाज़ा हो गया था कि मामला क्या है, उन्होंने बड़ी हिम्मत दिखाई और बस को अस्पताल की तरफ़ दौड़ा दिया।"

'मैं बेहोश हो गई'
कायनात कहती हैं कि वो पूरे रास्ते बार-बार अपने वालिद के पास जाने की बात कह रही थीं, फिर उन्हें कुछ याद नहीं, वो बेहोश हो चुकी थीं। अब वो अस्पताल से घर वापस आ गई हैं और उनके ज़ख़्म भी भर रहे हैं। मलाला का इलाज फ़िलहाल ब्रिटेन में जारी है।

मलाला ने पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा को लेकर आवाज़ बुलंद की थी। साल 2009 में उन्होंने बीबीसी उर्दू के लिए एक गुमनाम डायरी लिखी थी जिसमें लड़कियों की तालीम पर तालिबान की रोक का ज़िक्र था।

'कपड़े ख़ून से सने थे'
कायनात के पिता रियाज़ कहते हैं कि बेटी को गोली लगने की ख़बर मिलने के बाद जब वो अस्पताल पहुंचे तो देखा कि 'उसके शाल, शलवार ख़ून से लथपथ थे' और उन्हें लगा कि कहीं गोली पेट में तो नहीं लगी। वो कहते हैं, "मैं बस यही सोच रहा था कि क्या वो बच पाएगी?"

कायनात कहती हैं कि डॉक्टर चाहते थे कि वो इलाज तक अस्पताल में रुके लेकिन वो बेहद ख़ौफ़ज़दा थीं और घर जाने की बात कहती थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि हमलावर अस्पताल में पहुंच सकते हैं।"

हालांकि घर के बाहर सुरक्षाकर्मी मौजूद हैं लेकिन कायनात फिर भी डर को दिल से नहीं निकाल पातीं। मगर फिर भी वो कुछ देर के लिए एक बार अपने स्कूल गईं जहां टीचर और साथियों ने उनकी हौसलाअफ़ज़ाई की।
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कायनात कहती हैं, "मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं और वो स्कूल गए बिना मुमकिन नहीं होगा।" पिता रियाज़ ख़ुद एक शिक्षक हैं और मानते हैं कि कायनात और उनके साथियों के लिए तालीम से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता।
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