पाकिस्तान के लोगों के लिए 25 दिसंबर दोहरा महत्व रखता है। इस दिन जहां पाकिस्तान के ईसाई यीशु मसीह का तो वहीं देश अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का जन्मदिन मनाता है।
यहां के लोग इन्हें कायदे-आजम यानी महान नेता कहकर बुलाते हैं। अन्य देशों की तरह पाकिस्तान में इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। यह अवकाश क्रिसमस के मौके पर नहीं बल्कि जिन्ना के जन्मदिन के अवसर पर दिया जाता है।
देश और सत्ता में बैठे दक्षिणपंथी यह नहीं चाहते हैं कि वो किसी ऐसे पर्व पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करें जिसका जुड़ाव पश्चिम देशों और गैर-मुस्लिम जड़ों से जुड़ा हो। जिन्ना के सम्मान में सार्वजनिक अवकाश घोषित करने को सही ठहराया जा सकता है। आज के पाकिस्तान की छवि के निर्धारण में धर्म का सबसे बड़ा योगदान है।
लेकिन क्या यह सब जिन्ना के विचारों से मेल खाता है? क्या वे धर्म के सिद्धांतों पर आधारित धर्मशासित देश चाहते थे? और क्या वो एक ऐसा देश बनाना चाहते थे जहां हर तरह के आस्था में विश्वास रखने वाले लोगों को अपना सके?
और क्या वे पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे?
इतिहासकार और टिप्पणीकार यासीर लतीफ हमदानी कहते हैं, "जिन्ना ने अपने 33 भाषणों में नागरिक वर्चस्व, लोकतंत्र और अल्पसंख्यकों के सामान अधिकार के महत्व का जिक्र किया था। उनका कहना था कि इस्लाम के सिद्धांत समानता पर आधारित हैं।"
वो आगे कहते हैं, "लेकिन अभी जो भी पाकिस्तान में हो रहा है वो जिन्ना के विचारों से मेल नहीं खाता है।"
यासीर हमदानी विरोधी पार्टी तहरीके लब्बैक के रसूल अल्लाह के फैजाबाद में हाल ही दिए धरने का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह जिन्ना की चाहतों के बिलकुल विपरीत था।