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हमने ही बनाईं दहशतगर्दी की नर्सरियां: पाक मीडिया

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पेशावर के आर्मी स्कूल पर हुए हमले को बीते हफ्ते एक साल पूरा होने के मौके पर पाकिस्तान उर्दू अखबारों में चरमपंथ की चुनौती और उससे निपटने की रणनीति चर्चा का विषय रही। 'रोजनामा एक्सप्रेस' लिखता है कि 16 दिसंबर 2014 की त्रासदी ने जहां पूरे देश को हिला कर रख दिया था वहीं इसने दहशतगर्दी के खिलाफ पाकिस्तान को एकता और इरादे की लड़ी में भी पिरो दिया।
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अखबार लिखता है कि दहशतगर्दों के खात्मे के लिए उत्तरी वजीरिस्तान में ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब शुरू किया गया, जो खासा कामयाब रहा है, लेकिन ये जंग लंबी चलेगी और सब्र का इम्तिहान भी लेगी। अखबार कहता है कि ये जंग सिर्फ सेना की नहीं, बल्कि पूरे देश की है और सबको इसमें अपना किरदार निभाना होगा।

'रोजमाना पाकिस्तान' कहता है कि ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब और इससे पहले स्वात में कार्रवाई के नतीजे में दहशतगर्दों ने भागकर अफगानिस्तान में शरण ले ली और सरहदी चौकियों पर वो हमले भी करते रहते हैं। अखबार ने इन दहशतगर्दों के खात्मे के लिए अफगानिस्तान के सहयोग पर जोर दिया है। वहीं ‘रोजनामा दुनिया’ ने 16 दिसंबर को पाकिस्तान में हर साल ‘राष्ट्रीय शिक्षा संकल्प दिवस’ के तौर पर मनाने के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के फैसला का स्वागत किया है।
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'भारत से हठधर्मिता छोड़ने की मांग'

अखबार की टिप्पणी है कि 'आर्मी स्कूल के शहीद बच्चों के लिए इससे बेहतर भला क्या श्रद्धांजलि हो सकती है', लेकिन सिर्फ एलान कर देने भर से काम नहीं चलेगा। अखबार कहता है कि गरीबी और बदहाली के हालात में, समस्याएं और नाइंसाफियों के हालात में 'दहशतगर्दी की नर्सरियां हमने खुद कायम कर रखी हैं और इनके रहते कैसे दहशतगर्दी खत्म हो सकती है?'

वहीं ‘जंग’ का संपादकीय है- पाक भारत संबंधों के नए पहलू। अखबार लिखता है कि दोतरफा रिश्तों को लेकर भारत की मौजूदा सरकार के रुख में आई तब्दीली स्वागत योग्य है लेकिन जब तक दोनों देश सभी मुद्दों के न्यायोचित समाधान के लिए रजामंद नहीं होंगे, तब तक बातचीत का कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आएगा। अखबार लिखता है कि भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने समग्र वार्ता की बहाली को अच्छी शुरुआत करार देने के बावजूद एक बार फिर पुराने अंदाज में कहा है कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर भी भारत का हिस्सा है।

अखबार ने भारतीय विदेश मंत्री के बयान को बातचीत के लिए साजगार माहौल में रुकावट बताते भारत से हठधर्मिता छोड़ने को कहा है। वहीं ‘नवा-ए-वक्त’ कहता है कि बातचीत में कश्मीरी नेताओं को भी शामिल किया जाए और बातचीत में रुकावट डालने वाली ताकतों पर नजर रखी जाए। अखबार कहता है कि भारत में अगर कोई पार्टी कश्मीर मसले को हल करने की स्थिति में है तो वो भारतीय जनता पार्टी ही है, हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि वो दहशतगर्दी के खिलाफ मुहिम की ईमानदारी को जांच रहे हैं। अखबार कहता है कि पाकिस्तान को भी बातचीत के प्रति भारत की ईमानदारी पर नजर रखनी होगी।
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झारखंड उपचुनाव पर भी निशाना

रुख भारत का करें तो निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड में नाबालिग दोषी की रिहाई को लेकर ‘अखबार-ए-मशरिक’ ने संपादकीय लिखा है। अखबार कहता है कि इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जब 'तीन साल पहले दरिंदों ने दिल्ली की जिस पैरामेडिकल छात्रा निर्भया को गैंगरेप का शिकार बनाया था और कत्ल कर दिया, उसकी तीसरी बरसी पर उसके नाबालिग मुजरिम को रिहा किया जा रहा है।'

अखबार के मुताबिक ये वहीं दोषी है जिसके बारे में कहा जाता है कि अपराध के समय सबसे ज्यादा बरबरता उसी ने दिखाई थी। ‘दरिंदे की रिहाई का रास्ता साफ’ शीर्षक से ‘हिंदोस्तान एक्सप्रेस’ लिखता है कि देश के बहुत से लोग नहीं चाहते कि उसे फिलहाल रिहा किया जाए लेकिन कानून उसे तीन साल से ज्यादा की सजा देने की स्थिति में नहीं है। ‘कौमी तंजीम’ ने झारखंड की लोहरदगा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के हाथों एनडीए की हार पर संपादकीय लिखा है- झारखंड का झटका।

अखबार कहता है कि आमतौर पर होता ये है कि उपचुनाव में वही पार्टी जीतती है जिसकी राज्य में सरकार होती है, और ऐसा न हो तो इसे राज्य सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी माना जाता है। अखबार कहता है कि झारखंड में रघुबर दास के मुख्यमंत्री बनने के बाद से भाजपा का एक बड़ा तबका खुश नहीं है और ये लोग लगातार उनकी सरकार को कमजोर करने में लगे हुए हैं।
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