पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कई दिनों से जारी भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शन खत्म हो गए हैं।
'इस्लामाबाद लॉन्ग मार्च घोषणापत्र' पर प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे ताहिरुल कादरी और प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ के दस्तखत के बाद ये फैसला किया गया।
सरकार के इस्तीफे की मांग को लेकर चार दिनों से अपने हजारों समर्थकों के साथ इस्लामाबाद में डटे कादरी का सरकार के साथ समझौता बहुत अहम माना जा रहा है।
इस्लामाबाद में मौजूद बीबीसी संवाददाता शाहजेब जिलानी के अनुसार ये ताहिरुल कादरी की ओर से बीच का रास्ता ढूंढ़ने की एक कोशिश जैसा समझौता है, क्योंकि ये बहुत ही व्यापक है और किसी खास चीज पर कोई आश्वासन नहीं दिया गया है।
शाहजेब कहते हैं कि इसमें सरकार के लिए बाध्यकारी कोई भी बात नहीं है और क़ादरी ने अपनी जो लंबी मांग रखी थी ये समझौता उससे कहीं दूर रह गया। बीबीसी संवाददाता के अनुसार इस तरह से अचानक समझौता हो जाने से अब तक कादरी का समर्थन कर रहे लोगों का एक वर्ग काफ़ी निराश भी है। मगर ये ज़रूर है कि उनके उठाए मुद्दों ने लोगों की नब्ज को जरूर पकड़ा।
अचानक ये मुद्दा कादरी ने समाप्त करने का फैसला क्यों कर लिया इसे लेकर कोई स्पष्ट रूप से कुछ बता नहीं पा रहा है मगर इस पर अटकलों का बाजार गर्म जरूर है। आइए नजर डालते हैं कि इस समझौते में कौन सी अहम बातें शामिल हैं।
क्या हुआ करार
देश की संसद को 16 मार्च से पहले भंग किया जाएगा, जो इस संसद का निर्धारित कार्यकाल है। इसके बाद 90 दिनों के भीतर आम चुनाव कराए जाएंगे।
इससे पहले एक महीने का वक्त दिया जाएगा ताकि संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 के तहत नामजद होने वाले प्रतिनिधियों के नामांकन से पहले उनकी छंटनी की जाएगी। इससे चुनाव आयोग उनकी योग्यता की पड़ताल कर सकेगा। जब तक छंटनी की ये प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाएगी और चुनाव आयोग उनकी योग्यता पर फैसला नहीं करेगा, तब तक किसी भी उम्मीदवार को अपनी चुनाव महिम शुरू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
सरकार और पाकिस्तानी जन आंदोलन, दोनों संभवतः आम सहमति से विश्वस्त और निष्पक्ष समझे जाने वाले दो उम्मीदवारों के नाम कार्यवाहक प्रधानमंत्री के पद के लिए देंगे।
चुनाव आयोग के नए सिरे से गठन के बारे में 27 जनवरी को एक बैठक बुलाई जाएगी। ये बैठक लाहौर में ताहिरुल कादरी के संगठन मिनहाज उल कुरान के केंद्रीय सचिवालय में होगी। इसके बाद इस सिलसिले में होने वाली बैठकें भी मिनहाज उल कुरान के सचिवालय में ही होंगी।
27 जनवरी को होने वाली बैठक से पहले कानून मंत्री फारूक एच नाइक कुछ चुनिंदा वकीलों से एक सलाह मशविरा करेंगे और अपनी रिपोर्ट देंगे।
चुनाव सुधारों के बारे में सहमति बनी है कि चुनावों से पहले संविधान के निम्नलिखित अनुच्छेदों पर अमल करने पर ध्यान दिया जाएगा।
ए- संविधान के अनुच्छेद 62, 63 और 208(3)।
बी- संविधान के सेक्शन 77 और 82 जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1976 के सेक्शन हैं। दूसरे उन सेक्शनों पर भी अमल के लिए सहमति हुई है जो स्वतंत्र, निष्पक्ष और ईमानदारी के साथ चुनाव कराने में किसी भी तरह की अनियमितता को रोकने के बारे में हैं।
सी- 2011 की कानून याचिकों पर सुप्रीम कोर्ट के 8 जून 2012 के फैसलों पर पूरी तरह अमल किया जाएगा।
लॉन्ग मार्च के आयोजन के बाद दोनों पक्ष एक दूसरे के खिलाफ सभी तरह के मुकदमे वापस लेंगे और दोनों तरफ से एक दूसरे के खिलाफ या लॉन्ग मार्च में शामिल लोगों के खिलाफ किसी तरह की बदले की कार्रवाई नहीं की जाएगी। ये समझौता बहुत ही नेकनीयत और आम सहमति से किया गया है।