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पुलिस मुख्यालय भेजे गए मुशर्रफ़

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गिरफ़्तारी के बाद अपने घर में नज़रबंद पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को अब राजधानी इसलामाबाद के पुलिस मुख्यालय में भेज दिया गया है।
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उन्हें छह साल पहले ग़ैर क़ानूनी रूप से जजों को नज़रबंद रखने के मामले में गिरफ़्तार किया गया है। उस समय सरकारी अधिकारियों ने ये दलील दी थी कि जजों पर पाबंदी सुरक्षा कारणों से लगाई गई थी।

मुशर्रफ़ ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है। इस बीच पाकिस्तानी सीनेट के सदस्यों ने 2007 में देश में आपातकाल लगाने से जुड़े मामले में मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है।
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इससे पहले इस्लामाबाद की एक अदालत ने देश के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को दो दिन के लिए ट्रांजिट रिमांड पर भेजने का आदेश दिया था और कहा था कि उन्हें दो दिन के अंदर रावलपिंडी में आतंकवाद विरोधी अदालत में पेश किया जाए।

बीबीसी संवाददाता शहज़ाद मलिक के अनुसार मुशर्रफ़ ने खुद को पुलिस के हवाले किया और पुलिस उन्हें लेने के लिए उनके फॉर्महाउस पर गई जहां से वो रेंजरों की सुरक्षा में बुलेट प्रूफ कार में सवार अदालत आए।

उन्हें इस्लामाबाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट अब्बास शाह की अदालत में पेश किया।

उधर पुलिस ने इस्लामाबाद के मुख्य आयुक्त को पत्र लिखा है कि मुशर्रफ़ को सुरक्षा चिंताएं हैं इसलिए उनके घर को ही सब जेल घोषित किया जाए। मगर अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

अदालत ने पुलिस महानिरीक्षक या आईजी से मुशर्रफ़ की मदद करने वाले लोगों और अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से पालन न करने वाले पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी थी।

इन बातों पर गुरूवार को आईजी का कहना था, “हमारा मानना है कि देश में सुरक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है इसलिए मुशर्रफ़ को उनके घर में रहने देना चाहिए। वह इस्लामाबाद में ही रहेंगे और जब भी अदालत तलब करेगी वह उपस्थित होंगे।”

परवेज़ मुशर्रफ़ की गिरफ़्तारी का आदेश सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को 'गैर कानूनी' तरीके से हिरासत में रखने के मामले में दिया गया है।

गुरुवार को न्यायिक कार्यवाही के दौरान ही मुशर्रफ़ की सुरक्षा पर तैनात गार्डों ने अपनी हिरासत में ले लिया और इस्लामाबाद के बाहरी इलाके में उनके फॉर्म हाउस ले गए।

अदालत में पेशी

हमारे संवाददाता के अनुसार मुशर्रफ़ के वकील क़मर अफ़ज़ल ने सुनवाई के दौरान कहा कि उनके मुवक्किल ने कहीं यह नहीं कहा था कि न्यायाधीशों को नजरबंद किया जाए तो यह आरोप गलत हैं और इसका कोई सबूत नहीं है। लेकिन अदालत इससे सहमत नहीं थी।

क़मर अफ़ज़ल ने तर्क देते हुए कहा कि उनके मुवक्किल ने 3 नवंबर, 2007 में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को नज़रबंद नहीं किया बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए बाड़ लगाई गई थी जिस पर पीठ के प्रमुख का कहना था, "इस सादगी पर कौन न मर मिटे ख़ुदा।"

अदालत का कहना था कि परवेज़ मुशर्रफ़ ने देश की न्यायिक प्रणाली को नष्ट किया और न्यायाधीशों को नज़रबंद करने की वजह से पाकिस्तान की पूरी दुनिया में बदनामी हुई है।

चुनावी हथकंडा?

न्यायमूर्ति शौकत अज़ीज़ सिद्दीकी ने कहा कि ऐसा लगता है कि परवेज़ मुशर्रफ़ अपने खिलाफ मामलों का सामने करने के बजाय चुनाव में भाग लेने के लिए आए थे।

उल्लेखनीय है कि इस मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश शौकत अज़ीज सिद्दीक़ी बतौर वकील मुख्य न्यायाधीश सहित उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की दोबारा बहाली के आंदोलन में आगे रहे थे। इस आंदोलन के दौरान उन्हें कुछ दिनों के लिए जेल भी जाना पड़ा था।
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पाकिस्तान के कुछ राजनीतिक दलों ने मुशर्रफ़ की गिरफ़्तारी के आदेश का स्वागत किया था।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) के प्रवक्ता परवेज़ ने कहा कि आज न्यायपालिका और राजनीति की सर्वोच्चता का दिन है। वहीं एक दूसरे राजनीतिक कार्यकर्ता का कहना था कि सरकार को उन पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए जिन्होंने मुशर्रफ़ के भागने में मदद की।
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