कस्तराज मंदिर पंजाब के चकवाल जिले के कतस गांव में स्थित भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर है। कहा जाता है कि महाभारत काल में पांडव भाइयों ने कुछ समय यहां बिताया था। मुख्य मंदिर के आसपास कई छोटे मंदिर मौजूद हैं। यह मंदिर 900 साल से भी ज्यादा पुराने बताए जाते हैं। इन्हें छठीं शताब्दी के अंत का माना जाता है। जानकारों मुताबिक यहां मौजूद तालाब में चमत्कारी शक्तियां हैं और यहीं पर यक्ष और युधिष्ठिर संवाद हुआ था।
एक कथा के मुताबिक सती की मृत्यु के बाद भगवान शिव वर्षों तक रोते रहें। उनके आंसुओं से दो तालाब बने एक भारत के पुष्कर में और दूसरा कतस में। संस्कृत में केताक्ष का मतलब आंसू वाले नेत्र होता है, कालांतर में यही केताक्ष ही कतस हो गया। कस्तराज मंदिर सतगृह, हिंदू मंदिरों के एक समूह का हिस्सा है। मंदिर में दो झरोखे हैं और इसकी छत चूना पत्थर से बनी है।
हिंगलाज मंदिर बलूचिस्तान में है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव सती के शरीर के साथ तांडव कर रहे थे तब विष्णु ने उन्हें शांत करने के लिए सती के शरीर के 52 टुकड़े किये थे। सती का सिर यहां गिरा था। इसे नानी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए यहां तपस्या की थी। हर साल यहां एक बड़ा मेला लगता है जिसमें मुस्लिम नागरिक भी हिस्सा लेते हैं। यहां मुस्लिम भी हिंदुओं की तरह पूरी आस्था से देवी की आराधना करते हैं।
थरपारकर का यह जैन का मंदिर पाकिस्तान के पुरातात्विक महत्त्व वाले स्थलों में से एक है।
इस शक्तिपीठ का संबंध भी सती से है। शारदा पीठ 18 महा शक्तियों में से एक गई। कहा जाता है कि यहां देवी सती का दायां हाथ गिरा था। यहां बुद्धि और ज्ञान की देवी शारदा यानी सरस्वती की पूजा होती है। यहां के शारदी गांव में भाद्रपद शुक्लपक्ष के आठवें दिन श्रद्धालु जुटते हैं, इसमें भारत के भी श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह स्थान टिक्कर नाम की जगह से 40 किमी दूर है। टिक्कर कश्मीर के कुपवाड़ा से डेढ़ किमी दूर है, भारतीय इसी रास्ते का इस्तेमाल कर यहां जाते हैं।
यह मंदिर गुरु गोरखनाथ के अनुयायियों द्वारा बनाया गया है। कहा जाता है कि मंदिर की स्थापना गुरु गोरखनाथ ने त्रेता टैग में की थी। यह पेशावर के गोरगथरी के पास बसा है। 60 सालों के संघर्ष के बाद इसे 2011 में दोबारा खोला गया।