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पाकिस्तानः चूहा, बकरी, मूली-गाजर और पजामा का क्या करें

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पाकिस्तान में हर नेता डेमोक्रेसी का चैंपियन है। हर पार्टी चाहती है कि आम चुनाव में कभी कोई बाधा न आए मगर ये भी चाहता है कि खुद अपने दल के अंदर कभी चुनाव न होने पाएं। यदि तंग आकर पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने तमाम राज्यों को मजबूर किया है कि वो आने वाले सितंबर तक स्थानीय निकाय चुनाव मुकम्मल कर लें, वरना अदालत गुद्दी पकड़कर ये काम करवाएगी। इसके बाद खुदा-खुदा करके सूबा खैबर पख्तुनख्वा में 30 मई को स्थायनीय निकाय चुनाव हो रहे हैं।
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जो उम्मीदवार पार्टी टिकट पर ये चुनाव लड़ रहे हैं, उन्हें तो अच्छे अच्छे चुनावी निशान मिल गए हैं। लेकिन जो आजाद उम्मीदवार हैं वो सिर पकड़े रो रहे हैं। क्योंकि किसी को गाजर का निशान मिला है तो किसी को मूली थमा दी गई है और कोई भिंडी लिए घूम रहा है तो किसी को हरी मिर्च मिल गई है।
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बकरी और चूहे का क्या करें?

चलें यहां तक तो ठीक है, कम से कम उम्मीदवार अपने वोटर को ये तो कह सकता है कि अगर सरपंच बन गया तो सब्जी सस्ती करवा देगा।

मगर वो उम्मीदवार क्या करें जिन्हें चुनाव आयोग ने मुर्गे की तस्वीर पकड़ा दी या फिर बकरी दे दी। ऐसे ही एक उम्मीदवार ने चुनाव आयोग से अपील की कि भागवान, बकरी की जगह बकरा ही दे दो, कुछ तो इज्जत रह जाए पठान वोटरों के बीच।

इस पर चुनाव आयोग के एक मेंबर ने उम्मीदवार के कान में कहा, शुक्र करो बकरी मिल गई जिन्हें चूहा, साँप, मगरमच्छ, ऐश ट्रे और बच्चों का फीडर टिका दिया गया है उनसे जाकर पूछो। ये सुनते ही उम्मीदवार बकरी की तरह सिर झुकाकर कमरे से सटक लिया।
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खां साहब का पाजामा

मगर वो खां साहब क्या करें जिन्होंने सारा जीवन सलवार-कमीज में बिता दिया लेकिन चुनाव आयोग ने पाजामे का निशान थमा दिया। ये गरीब तो अपना चुनाव निशान बांस पर लटकाने से भी गया।

अलबत्ता उसके विरोधी उम्मीदवार के कार्यकर्ता जरूर प्लास्टिक का मगरमच्छ उठाए गली गली घूम रहे हैं और इस मगरमच्छ की थूथनी से आधा पाजामा लटक रहा है....और भाग लो स्थानीय निकाय चुनाव में!
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