मंजूर अहमद पश्तीन पठान
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25 साल के मंजूर पश्तीन पाकिस्तान के युद्ध ग्रस्त इलाके दक्षिणी वजीरिस्तान से ताल्लुक रखते हैं। यह इलाका पाकिस्तानी तालिबान की मजबूत पकड़ के लिए जाना जाता रहा है।
मंजूर पश्तीन पाकिस्तान के अखबारों की सुर्खियों में तब आने लगे जब पिछले साल जनवरी में दक्षिणी वजीरिस्तान के रहने वाले एक युवक नकीबुल्लाह मेहसूद की कराची में हुए पुलिस एनकाउंटर में मौत हो गई थी।
नकीबुल्लाह एक उभरते हुए मॉडल थे। उनकी मौत के खिलाफ लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिसमें मंजूर पश्तीन शामिल हो गए और बहुत ही कम वक्त में वे सुर्खियों में छा गए।
मंजूर पश्तीन की पहचान पाकिस्तान के पिछड़े और दबे-कुचले समाज की आवाज के रूप में की जाती है। पाकिस्तान में दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह पश्तून लगातार अपनी सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और समान अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
मंजूर पश्तीन ने साल 2014 में पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट की शुरुआत की थी, लेकिन यह अभियान बहुत ज्यादा कमाल नहीं दिखा पाया। जनवरी 2018 में हुए नकीबुल्लाह की मौत के बाद वो एक खास वर्ग समूह के लिए एकाएक हीरो बन गए। मौत के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन देश के कई हिस्सों में फैलने लगा।
इन विरोध प्रदर्शनों के बीच मंजूर पश्तीन ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी पहुंच पश्तून युवाओं तक बनानी शुरू कर दी और अपने भाषणों को इनके बीच शेयर करने लगे। इन भाषणों में वो कबायली समुदाय विशेषकर पश्तूनों के हक की मांग करते दिखे। युवा इन भाषणों से प्रभावित होकर उनके आंदोलन से जुड़ते चले गए।
बाद में उनके आंदोलन से युद्धग्रस्त इलाकों से लापता हुए लोगों के परिजन भी जुड़ने लगे और मंजूर पश्तीन इनकी मुश्किलों और ड्रोन हमलों के पीड़ितों के मुद्दे भी उठाने लगे। आंदोनल का अंत होते-होते पूरे पाकिस्तान में पश्तूनों के अभियान को नया स्वरूप मिल गया। ये आंदोलन जमीन के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी चल रहे थे।
पिछले साल बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में मंजूर पश्तीन ने कहा था, "मैंने कुछ भी नहीं किया, इन लोगों (आदिवासी इलाकों के लोग) का लगातार शोषण हुआ है, उनकी जिंदगी दूभर हो चुकी है, वे सभी दबे-कुचले लोग हैं उन्हें सिर्फ एक आवाज चाहिए थी जो मैं दे रहा हूं।"
सरकार के लिए चुनौती
मंजूर पश्तीन की आवाज जैसे-जैसे मजबूत हो रही थी, पाकिस्तानी सरकार के लिए वो एक चुनौती बन कर उभर रहे थे।
आरोप हैं कि आंदोलन को बड़ा रूप न मिल सके, इसके लिए सरकार ने पीटीएम से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगा दी है। यह भी आरोप हैं कि यह सबकुछ सेना के कहने पर किया जा रहा है, लेकिन इसके कोई सबूत नहीं मिलते हैं।
मंजूर पश्तीन ने बीबीसी से कहा था कि आदिवासी लोगों को चरमपंथियों जैसा समझा जाता रहा है। उन्होंने कहा था, "हम सिर्फ अपनी इज्जत और सम्मान वापिस पाना चाहते हैं, हम सड़कों की मांग नहीं कर रहे, विकास नहीं चाहते, हम सिर्फ अपने जीने का अधिकार मांग रहे हैं।"
स्वाभिमान को ठेस
पश्तूनों को यह लगता है कि वो सेना और चरमपंथियों के बीच पिस रहे हैं। स्थिति यह है कि एक ही रास्ते पर तालिबान और पाक सेना, दोनों के चेक पोस्ट हैं। अगर इस रास्ते पर कोई दाढ़ी वाला चलता दिखता है तो पाक सेना उसे चरमपंथी बताती है और अगर आपकी दाढ़ी नहीं है तो तालिबानी आपको सरकार का समर्थक बताते हैं।
मंजूर पश्तीन पश्तो में बोलते हैं लेकिन दूसरे कबायली युवाओं से उलट वो शिक्षित हैं और उर्दू और अंग्रेजी में आसानी से बात करते हैं। मंजूर पश्तीन का कहना है कि उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं थी कि उन्हें इतना बड़ा समर्थन मिलेगा, लेकिन उनको यकीन है कि उन्हें क्या करना है।
उन्होंने एक बार बीबीसी पश्तो से कहा था, "लोगों पर जुल्म किया जा रहा है। उनका जीवन असहनीय हो गया था। कर्फ्यू और अपमान ने उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाया है।" मंजूर पश्तीन के आंदोलन को धीरे-धीरे राजनेताओं का भी समर्थन मिलने लगा है और यह पाकिस्तान सरकार से सामने आने वाले वक्त में एक बड़ी राष्ट्रीय चुनौती के रूप में उभर सकता है।