बीते दो दिनों में पाकिस्तानी मीडिया में मलाला युसुफ़ज़ई को इलाज के लिए
ब्रिटेन लिए जाने की ख़बर छाई रही है। जिओ न्यूज़, आज टीवी और दुनिया जैसे
समाचार चैनलों पर पाकिस्तान सेना की ओर से आए बयानों के हवाले से ख़बर
लगातार दिखाई गई।
ट्विटर पर भी कई घंटों तक ये विषय ट्रैंडिंग करता रहा। ट्विटर पर कई लोगों ने मीडिया में मलाला पर हमले की ख़बर की कवरेज की आलोचना भी हुई।
ट्विटर पर 'जानीसलाम' नाम के यूज़र ने मीडिया पर मलाला को ब्रिटेन ले जाए जाने की ख़बर पर लिखा, " ठीक है, मलाला को यूके ले जा रहे हैं। अब क्या? उसका बुत बनाओगे क्या?"
एक अन्य यूज़र ज़ुबैरज़िविनिया ने ट्विटर पर लिखा, "मैं मलाला मलाला सुनकर पक गया हूं। कोई ड्रोन हमलों के पीड़ितों की बात क्यूं नहीं कह रहा है।" मोहम्मद रफ़ी ने ट्विटर पर सवाल उठाया कि मुल्ला फ़ज़लुर्रहमान और मुनव्वर हसन मलाला के हमलावरों की आलोचना कर रहे हैं तो क्या वे मलाला के लड़कियों की शिक्षा के बारे में विचारों से भी सहमत हैं?
सैन्य हस्तक्षेप
पाकिस्तानी पीपुल्स पार्टी की एक नेता फ़रहानाज़ इस्पहानी ने ट्विट किया, " मलाला युसुफ़ज़ई पर जमाते इस्लामी हमला दुखदायी है। ये लोग और कितना गिर सकते हैं?"
तुफ़ैल मलिक ने ट्विट किया कि तालिबान के ख़िलाफ़ और मलाला के पक्ष में कराची में सबसे बड़ी रैली आयोजित करने का श्रेय मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट को जाना चाहिए।
कई लोगों ने ट्विटर पाकिस्तानी सेना की भी आलोचना की। दो लोगों ने ट्विट किया कि मीडिया सिर्फ़ सेना से मिली जानकारी के आधार पर ख़बर चला रहा है।
उधर उत्तरी वजीरिस्तान पर पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई के मुद्दे पर अख़बारों में गर्मागर्म बहस भी छिड़ी है। दक्षिणपंथी उर्दू अख़बार जसारत ने लिखा, "ये साफ़ है कि मलाला के मुद्दे का इस्तेमाल उत्तरी वजीरिस्तान में सैन्य हस्ताक्षेप के लिए किया जाएगा।"
इससे उलट उर्दू अख़बार डैली एक्सप्रैस ने लिखा, "सैन्य हस्तक्षेप की मांग की गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अगर ऐसे तत्त्वों को हराया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति मज़बूत हो जाएगी।"