पाकिस्तान के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में लडकों की तुलना में लडकियों की तादाद ज्यादा है। पर उनमें से ज्यादातर लडकियां डिग्री हासिल करने के बाद भी डाक्टर के रूप में प्रैक्टिस नहीं करती हैं।
वे घर संभालती हैं।पाकिस्तान मेडिकल एंड डेंटल काउंसिल ने यह माना है कि मेडिकल कॉलेजों में 70 फीसद छात्र महिलाएं हैं।सरकारी आंकडे बताते हैं कि ज्यादातर महिला डाक्टर इस पेशे को नहीं अपनाती हैं, वे पत्नी और मां के रूप में घर संभालती हैं।
कुल पंजीकृत डॉक्टरों में सिर्फ 23 फीसद ही महिलाएं हैं।इन कॉलेजों में दाखिला काफी मुश्किल भरा होता है। मोटे तौर पर 100 सीटों के लिए करीब 10,000 प्रतियोगी अर्जी डालते हैं।
लड़कियां बाहर नहीं जा सकती
इन प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में भर्ती के लिए 90 फीसद या उससे ज्यादा
नंबर चाहिए। पांचवें साल की पढाई कर रहे एक छात्र ने बताया, ''लडके अपन
दोस्तों के साथ गपशप में ज्यादा समय बिताते हैं। लडकियां बाहर नहीं जा सकती
हैं।
इसलिए वो अपने समय का इस्तेमाल घर पर बैठकर पढने में करती
हैं।''दूसरे शब्दों में, लडकियों की कामयाबी की वजह उनकी अपनी कडी मेहनत तो
है ही लेकिन लडकियों को घर में रखने की संस्कृति के कारण मजबूरी में ही
सही उन्हें पढाई में ध्यान देने का और अधिक मौका मिल जाता है।
इस्लामाबाद के
शहीद जुल्फिकार अली भुट्टो मेडिकल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर जावेद
अकरम का मानना है कि लडकों की तुलना में लडकियां पढाई लिखाई में ज्यादा
होशियार होती हैं, वे उस पर अधिक ध्यान देती हैं। पर इसके साथ वो यह भी
मानते हैं कि कुछ लडकियां डॉक्टर के रूप में करियर बनाने के बजाय पति चुनने
की फिराक में अधिक रहती हैं।
शादी करने में आसानी!
वो कहते हैं, ''डॉक्टर बनने के बाद शादी करने
में काफी आसानी होती है। कई लडकियां डाक्टरी के पेशे को चुनना वाकई पसंद
नहीं करती हैं।''उनका कहना है, ''मैं ऐसे हजारों लडकियों को जानता हूं, जो
क्वालीफाइड डॉक्टर या डेंटिस्ट हैं, पर उन्होंने एक भी मरीज का इलाज नहीं
किया है।'
'कई डाक्टरों ने, जिनमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं, मुझे
निजी तौर पर बताया कि मेडिकल डिग्री शादी के बाजार में वाकई एक जबरदस्त चीज
है।कामरान अहमद और उनकी पत्नी आइशा एक मैरेज ब्यूरो चलाते हैं। उनका
कारोबार अच्छा है। वे ब्यूरो की दूसरी शाखा इस्लामाबाद में खोलने वाले
हैं।
अहमद कहते हैं कि उनके पास आने वाले ज्यादातर ऐसी माँएं हैं जो अपने
बेटे के लिए डॉक्टर बहू चाहती हैं। अपनी बहू का परिचय डॉक्टर के रूप में
करवाने से सम्मान बढता है।वे कहते हैं, ''अगर आप किसी कुंवारी महिला डॉक्टर
को जानते हैं तो मुझे जरूर बताएं, मेरे पास ऐसे कई लडके हैं जो डाक्टर
बीवी खोज रहे हैं।''
डॉक्टर बीवी ट्रॉफी!
पर 'डॉक्टर बीवी' ट्रॉफी से बढ कर है। अस्पतालों में
उनकी गैर-मौजूदगी पाकिस्तान के पूरे स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था पर बुरा असर
डाल रही हैं।सरकार एक डॉक्टर तैयार करने पर लाखों रुपए खर्च करती है, पर
अस्पतालों में उनकी कमी है।
ग्रामीण इलाकों में संकट ज्यादा है क्योंकि
वहां कई औरतें सिर्फ महिलाओं से अपना इलाज करवाना चाहती हैं।पीएमडीसी की
डॉक्टर शाइस्ता फैसल ने एक शोध किया है। इसके आधार पर मेडिकल कॉलेजों में
लडकियों की तादाद सीमित रखने के उपाय किए जाएंगे।जब मेडिकल कॉलेजों में
लडके और लडकियों का कोटा तय करने की खबर फैली तो तीखी प्रतिक्रिया हुई।
शाइस्ता कहती हैं, ''यह कोटा नहीं है। हम चाहते हैं कि मेडिकल कॉलेजों में
आधे स्त्री और आधे पुरुष पढें। यह कोई भेदभाव भी नहीं है।''मानवाधिकार
मामलों के वकील शाहजाद अकबर इस कोटा व्यवस्था के सख्त खिलाफ हैं।
समझाने का प्रयास करूंगी
वो कहते
हैं, ''यह पूरी तरह गलत है। यहां महिलाओं के साथ इसलिए भेदभाव किया जा रहा
है, क्योंकि वो अधिक स्मार्ट हैं।''कोटा व्यवस्था को चुनौती देते हुए अकबर
ने अदालत में एक याचिका दायर की है।
इसे असंवैधानिक बताते हुए वो कहते हैं
कि सरकार को महिलाओं को इस पेश में बने रहने के लिए प्रेरित करना
चाहिए।वहीं मेडिकल स्कूल में उम्मीदों से लबरेज दो छात्राओं ने बताया कि वो
डॉक्टर बनने को लेकर दृढ हैं। मैंने जब उनसे पूछा कि अगर उनसे परिवार और
पेशे में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए, तो वो किसे चुनेंगी।
अलिया
खावर कहती हैं, ''मैं अपने परिजनों को समझाने का प्रयास करुंगी। अगर वो
नहीं माने तो मैं परिवार को चुनूंगी।''उनके साथ पढने वाली मांजा मकसूद इससे
सहमति जताते हुए कहती हैं, ''हमारी संस्कृति में परिवार पहले आता है।''