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पाक-सऊदी अरब में क्या खिचड़ी पक रही है?

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बार-बार इनकार के बावजूद सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस सऊद अल-फैसल और रक्षा उपमंत्री प्रिंस सुलेमान बिन सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ की यात्रा के मकसद को लेकर अफ़वाहें जारी हैं।
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इन अफ़वाहों में सऊदी अरब के परवेज़ मुशर्रफ़ की मदद करने, सऊदी अरब से पाकिस्तानी तालिबान से वार्ता में मदद करने से लेकर सीरियाई विद्रोहियों को प्रशिक्षण देने में पाकिस्तान की सहायता लेने जैसी बातें शामिल हैं।

इस महीने की शुरुआत में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस सऊद अल-फ़ैसल की यात्रा से भी पहले पाकिस्तान में पूर्व सैन्य तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ की सुरक्षित निकासी की अफ़वाहें पाकिस्तान भर में गूंजती रहीं।
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न्यूयॉर्क टाइम्स के इस्लामाबाद संवाददाता सईद शाह ने यात्रा से चार दिन पहले दो जनवरी को ट्वीट किया, "षड्यंत्रकारी सिद्धांतकार कह रहे हैं कि सऊदी विदेश मंत्री की निर्धारित यात्रा के चलते, मुशर्रफ़ अदालत के बजाय अस्पताल जाएंगे।"

जंग समूह के पत्रकार मुर्तज़ा अली शाह ने छह जनवरी को ट्वीट किया, "सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस सऊद अल-फ़ैसल मुशर्रफ़ को बचाने के लिए इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री के लिए संभव नहीं है कि वह अपने सरंक्षक को इनकार कर दें।"

मुर्तज़ा अली शाह, पत्रकार जंग समूह "सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस सऊद अल-फ़ैसल मुशर्रफ़ को बचाने के लिए इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री के लिए संभव नहीं है कि वह अपने सरंक्षक को इनकार कर दें।"

कैसे रहेंगे पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंध?

यह अफ़वाहें सिर्फ़ सोशल मीडिया तक महदूद नहीं रहीं। डॉन और नवा-ए-वक्त जैसे गंभीर अख़बारों में भी इस तरह के समाचार थे कि मुशर्रफ़ को स्वास्थ्य कारणों से देश के बाहर जाने की इजाज़त मिल सकती है।

डॉन अख़बार ने अपनी वेबसाइट में छह जनवरी को ख़बर दी, "पाकिस्तान और सऊदी सरकार के बीच परवेज़ मुशर्रफ़ की सुरक्षित निकासी के सौदे के स्थानीय मीडिया के कयासों के बीच सऊद अल-फ़ैसल की यात्रा हो रही है।"

यह कयास इतने मजबूत थे कि यात्रा पर आए राजनयिकों को इस आशय का खंडन करने के लिए बयान जारी करना पड़ा।

न्यूज़वीक पाकिस्तान की वेबसाइट में सात जनवरी को ख़बर थी, "सऊदी विदेश मंत्री ने उन ख़बरों का खंडन किया है कि वह परवेज़ मुशर्रफ़ की निकासी पर बात करने के लिए आए हैं।"

प्रोटोकॉल का उल्लंघन
पाकिस्तान के मीडिया में दूसरा कयास यह लगाया जा रहा था कि सऊदी अरब पाकिस्तान सरकार और तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) के बीच शांति वार्ता करवाने में सहायता कर रहा है।

पाकिस्तान के अंग्रेजी अख़बार दि एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने प्रिंस सऊद अल-फ़ैसल के इस्लामाबाद पहुंचने वाले दिन ही ख़बर की, "पाकिस्तान दीर्घकालिक शांति के लिए तहरीक-ए-तालिबान के साथ शांति वार्ता में सऊदी अरब से मध्यस्थता करवाने की योजना बना रहा है।"

ईटी रिपोर्टर कामरान यूसफ़ की रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "इस मामले से जुड़े हुए सूत्रों ने बताया है कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ सऊदी विदेश मंत्री से आग्रह करेंगे कि वह अपने देश के 'अच्छे संबंधों' का इस्तेमाल टीटीपी को समझौते के लिए तैयार करने में करे।"

रक्षा विश्लेषक तलत मसूद ने भी अख़बार के इस विचार का समर्थन किया कि सऊदी अरब टीटीपी की आर्थिक सहायता कम करके उस पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकता है।

क्या पाकिस्तान होगा फायदा?

पत्रिका के अनुसार, इस समय भी एक ऐसी योजना पर चर्चा चल रही है जिसमें पाकिस्तान को, दो विद्रोही ब्रिगेड या 5,000 से 10,000 लड़ाकों को प्रशिक्षण देने की, ज़िम्मेदारी दी जाए।

सऊदी विदेश मंत्री सऊद अल-फ़ैसल के पीछे-पीछे प्रिंस सलमान बिन सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सऊद के नेतृत्व में 21 जनवरी को सऊदी अरब का रक्षा मंत्रालय का प्रतिनिधिमंडल भी आया।

डॉन अख़बार में छपी ख़बर के अनुसार, रक्षा उपमंत्री को जनरल हेडक्वार्टर्स (जीएचक्यू) में पहुंचने पर गॉर्ड ऑफ़ ऑनर दिया गया जो कि "प्रोटोकॉल से हटना है।"

प्रिंस सलमान बिन सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सऊद ने प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता से पहले सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ से मुलाकात की।

अपनी यात्रा के पहले दिन प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान एयर फ़ोर्स के एयर डिफ़ेंस कमांड को देखा और पाकिस्तान के स्वदेश निर्मित कमांड और कंट्रोल सिस्टम में रुचि दिखाई।

डॉन अख़बार में छपी एक ख़बर के अनुसार, "सऊदी अरब सुपर मशरक ट्रेनिंग एयरक्राफ़्ट और जेएफ-17 थंडर फ़ाइटर जेट खरीदना चाहता है।"

मध्य पूर्व के कुछ विश्लेषकों का मानना है कि फ़ैसल की इस्लामाबाद यात्रा का एकमात्र मकसद ईरान को दूर रखने के उद्देश्य से रियाद में खाड़ी सैन्य ताकत स्थापित करना ही नहीं था।
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पाकिस्तान की सैन्य सहायता नई नहीं

लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस के मध्य पूर्व केंद्र में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर डॉक्टर मदावी अल-राशिद ने अल-मॉनिटर वेबसाइट में 8 जनवरी को प्रकाशित अपने लेख में कहा, "सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों को पाकिस्तान की सैन्य सहायता नई नहीं है।

यह विश्वसनीय है, कम विवादित है और अन्य स्रोतों के मुकाबले सस्ती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पूरी तरह अनुबंधित है और दूसरी जगह से मिलने वाली सैन्य सहायता की तरह इसके राजनीतिक मायने नहीं हैं।"

वह कहती हैं, "फिर भी, सऊदी अरब को बाहरी खतरों के बजाय आंतरिक वजहों से पाकिस्तान से सुरक्षा सहायता की ज़रूरत हो सकती है। चूंकि पाकिस्तान भी इस्लामी देश है इसलिए पाकिस्तानी सैनिकों को बिना किसी आलोचना के धार्मिक स्थलों में तैनात किया जा सकता है।"

पाकिस्तान में सोशल मीडिया में सक्रिय लोग पाकिस्तान-सऊदी अरब संबंधों पर कड़ी नज़र रख रहे हैं और संबंधों के किसी एक हिस्से में प्रगाढ़ता किसी अन्य कयास को जन्म दे सकती है।

एक पाकिस्तानी ब्लॉगर फ़ातिमा अंसारी ने 28 जनवरी को ट्वीट किया, "अगर मुशर्रफ़ पाकिस्तान से सफलतापूर्वक सऊदी अरब के लिए निकल जाते हैं तो इसका मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान ने सीरियाई विद्रोहियों को प्रशिक्षण देने में सहमति जता दी है।"
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