यह तीसरा दौर उन्हें बहुत दर्द दे कर आया है। नवाज़ शरीफ़ के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया था जब वो राजनीति में हाशिए पर आ गए और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर मे उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी गई थी।
उऩ्हें फांसी नहीं दी गई और विदेशी सरकारों के बीच बचाव के बाद उन्हें परिवार समेत सऊदी अरब निर्वासित कर दिया गया। लेकिन उन्होंने न सिर्फ देश में वापसी की, बल्कि अब देश की कमान भी संभालने जा रहें हैं।
आज अगर पाकिस्तान में कोई फौज़ के चौतरफा मौजूद रसूख को कम कर सकता है तो वो नवाज़ शरीफ़ ही हैं। उनका और फौज का नाता अनोखा है।
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गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि
जितना यह सच है कि फौज के चलते उनकी जान पर बन आई थी उतना ही यह भी सच है कि वो राजनीति में लाए भी फ़ौज द्वारा गए थे। नवाज़ शरीफ़ की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नही रही।
1976 में जब प्रधानमंत्री जुल्फ़िकार अली भुट्टो ने शरीफ़ परिवार के स्टील के कारोबार का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस घटना ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया और वो पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सदस्य बन गए।
1981 का साल नवाज़ शरीफ़ के लिए बेहद महत्वपूर्ण साल रहा, जब जनरल ज़िया उल हक की मार्शल ला की सरकार के दौर में पंजाब राज्य का वित्तमंत्री बनाया।
1985 में उन्हें पंजाब प्रांत का मुख्यमंत्री नियुक्त किया। लेकिन राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक़ ने शरीफ़ की सरकार को 31 मई 1988 को बर्खास्त कर दिया।
एक विमान हादसे में राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक़ की मौत के बाद शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (पीएमएल) फ़िदा ग्रुप और जुनेजो ग्रुप में बंट गई। जुनेजों ग्रुप का नेतृत्व मोहम्मद खान जुनेजो के हाथ में था।
इन दोनों ग्रुपों ने 1989 के आम चुनावों में बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) का मुक़ाबला करने के लिए सात धार्मिक और रूढ़िवादी पार्टियों के साथ गठबंधन कर इस्लामी जम्हूरी इत्तेहाद (आईजेआई) के नाम से एक मोर्चा बनाया।
इस गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। नवाज शरीफ़ ने नैशनल असेंबली में बैठने की जगह पंजाब प्रांत का मुख्यमंत्री बनना बेहतर समझा।
नवाज शरीफ़ नवंबर 1990 में देश के 12वें प्रधानमंत्री बने। लेकिन सेना के बढ़ते दबाव की वजह से उन्होंने अप्रैल 1993 में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 1993 में बहाल कर दिया था।
1997 में हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी ने एक बार फिर पाकिस्तान की सत्ता हासिल कर ली और नवाज़ शरीफ़ फिर प्रधानमंत्री बने।
फांसी के फंदे से लौटकर फिर पीएम की कुर्सी तक
नवाज़ बनाम सेना
नवाज़ शरीफ़ शासन में सेना के हस्तक्षेप के ख़िलाफ थे. कई मौकों पर उनका सेना के साथ टकराव हुआ।
तत्कालीन सेना अध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने 12 अक्टूबर 1999 को उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया।
नवाज़ पर आरोप लगा कि उन्होंने श्रीलंका से आ रहे मुशर्रफ के विमान का अपहरण करने और आतंकवाद फैलाने की कोशिश की। बाद में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया।
सरकार के साथ हुए एक कथित समझौते के बाद उन्हें परिवार के 40 सदस्यों के साथ सऊदी अरब निर्वासित कर दिया गया। वे 2007 में एक बार फिर स्वदेश लौटे।
तालिबान की बुलेट का जवाब बैलट से
2008 के आम चुनाव में उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ (पीएमएल-एन) ने अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या की वजह से पैदा हुई सहानुभूति की वजह से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को अधिक सीटें मिली और उसने सरकार बनाई।
पाँच साल तक नवाज़ शरीफ़ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार को गिराने की कोशिश नहीं की और अपनी बारी की प्रतीक्षा करते रहे।
2013 का चुनाव नवाज़ शरीफ़ के लिए फिर से सत्ता में वापसी का मौका लेकर आया है।