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कोई रोल मॉडल है पाकिस्तान में

Sun, 23 Oct 2016 04:44 PM IST
बीबीसी
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नवाज शरीफ - फोटो : BBC
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रोल मॉडल वह लंगर है जो किसी भी संगठन, राष्ट्र या देश को थामे रहता है। जीवन में नाकामियों को चीरते हुए कामयाबी के उजाले तक ले जाने के लिए नई पीढी को बिना थके ताकत और साहस देता है।
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क्या आज पाकिस्तान में कोई इंसान, संस्था या संगठन को रोल मॉडल की परिभाषा पर खरा उतरता है? आपके संबंध किसी भी वर्ग से हों, जरा अपनी और आसपास वालों की रोजमर्रा की बातचीत पर महज पांच मिनट गौर कर के देखें। 90 फीसद बातचीत अतीत की धुरी पर घूम रही है...

हमारे दादा, अल्लाह बख्शे कभी अकेले खाना नहीं खाते थे। हमारे पिता ने कभी जरूरत से एक पैसा भी ज्यादा अपने पास नहीं रखा। जिन्ना साहब जल्दी मर गए वरना ये हालत नहीं होती। अय्यूब सैनिक थे मगर तरक्की की बुनियाद भी उन्होंने ही रखी।
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भुट्टो साहब फांसी चढ गए, मगर किसी तानाशाह से दया नहीं मांगी। बेनजीर को पता था कि मौत उनके पीछे है, फिर भी पाकिस्तान आईं। सन 65 की लडाई में पाकिस्तानी सेना के जवान सीने पर बम बांध के टैंकों के सामने लेट गए।

क्या पीआईए था। बाकमाल लोग और लाजवाब उडान। सुभान अल्लाह। और जब यह पूछा जाए कि कोई जीवित रोल मॉडल भी है तो आमतौर पर इस तरह के जवाब मिलते हैं... अजी छोडिए, कितने अरमानों से मुल्क बनाया था। क्या हालत कर दी 70 बरसों में।
 






 

इस भोली सूरत के पीछे एक महाबली बैठा है

इमरान खान - फोटो : BBC
नवाज शरीफ तो ऐसा दिखावा कर रहे हैं जैसे पनामा गेट हुआ ही नहीं। इस भोली सूरत के पीछे एक महाबली बैठा है, जिसके सिवाय जिल्ले इलाही का इकबाल बुलंद रहे। कुछ भी सुनाई नहीं देता। भाई जितनी ऊंची दुकान उतने फीके पकवान। और इमरान खान?...शुरू में कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन अब तो लगता है कि उसका विजन भी गैंडे जैसा है।

इधर उधर देखे बिना, खुरों से चिंगारी निकालते हुए नाक की सीध में भाग पडना। सामने भले दीवार ही क्यों न हो। खान साहब को कोई कान में कह दे कि आपका कान कौआ ले गया, तो वो कान देखे बिना कौए के पीछे दौड पड़ते हैं। वैसे बहुत अच्छे इंसान हैं। और बिलावल?... अरे साहब क्या बताएं।

यह बच्चा तो नाना और अम्मा की राजनीतिक दुकान पर बैठा है। इस ठेले को तो पिता और बुआ खींचे फिर रहे हैं। भुट्टो के नाम पर बाबा, जो दे उसका भी भला, न दे उसका भी भला। कोई नया आइडिया नहीं, नारा नहीं, एजेंडा नहीं। बस गप्पें लगवा लो और वह भी किसी और की रटाई हुई।

और सेना? सेना हालांकि इस देश का एकमात्र संगठित राजनीतिक दल है। मगर रोल मॉडल को यह शोभा नहीं देता कि उसका नाम डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी, जबरन गुमशुदगियों और कठपुतली तमाशे की डोरियां हिलाने वालों से जुड़ जाए। सारा ध्यान अगर प्रोफेशनलिज्म पर ही हो तो बहुत अच्छा रोल मॉडल है। हर कुछ साल बाद इसलिए भी अच्छी लगने लगती है कि बाकी संस्थान तो बिल्कुल चौपट हैं।
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थप्पड से नहीं, प्यार से डर लगता है साहब…

पीएम मोदी - फोटो : BBC
हां न्यायपालिका भी बहुत अच्छा रोल मॉडल बन सकती थी। इफ्तिखार चौधरी को मौका भी मिला लेकिन उन्होंने ज्यादातर ताकत मीडिया का दूल्हा बने रहने और दो कॉलमों, आठ कॉलमों के चक्कर में बर्बाद कर दिया। आम इंसान आज भी इंसाफ के लिए पहले की तरह जूतियां घिस रहा है।

तो फिर जीवित रोल मॉडल कहाँ खोजा जाए? क्या आप अपने बच्चों के लिए रोल मॉडल हैं? यदि नहीं, तो बुकराती बंद कीजिए और खुद आदर्श बनने की कोशिश कीजिए। आपके होते आपके बच्चों को किसी रोल मॉडल की ओर देखने की जरूरत ही क्यों आए?

रोल मॉडल आपके आस पडोस में ही कहीं न कहीं मौजूद है। इसे नवाज शरीफ, राहील शरीफ, सुप्रीम कोर्ट या इमरान खान में मत ढंढिए। और यह महज आपकी ही समस्या नहीं। इसकी तलाश हर तरफ है।

भारत में 56 इंच का सीना तो मौजूद है, लेकिन रोल मॉडल कहां है? अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीति में कूदने की वजह से यह सवाल और तेजी से चर्चा में है कि रोल मॉडल जाए भाड़ में।

यहाँ तो बुनियादी शराफत के भी लाले पडे़ हैं। और जब ये सारे संस्थान और व्यक्तित्व दबंग अंदाज में दिल लुभावनी मुस्कान सजाए, बार बार ठगी जनता का दिल जीतने के लिए खुद को बतौर रोल मॉडल पेश करने की कोशिश करते हैं तो जनता भी उसके बगल में क्या सोचे? थप्पड से नहीं, प्यार से डर लगता है साहब…
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