'जस्टिस चौधरी', 'जानी दोस्त', 'नया कदम', 'आग और शोला', 'बलिदान', 'सल्तनत', 'मास्टरजी', 'जाग उठा इंसान', 'इंकलाब', 'अक्लमंद', 'नजराना', 'आखिरी रास्ता', 'कर्मा', 'मकसद', 'सुहागन', 'निगाहें', 'जाबांज', 'तोहफा', 'घर संसार', 'औलाद', 'सदमा', 'हिम्मतवाला', 'नगीना', 'मिस्टर इंडिया', 'चांदनी'।
हम श्रीदेवी की गैरकानूनी भारतीय फिल्में और वो भी हॉस्टल के हॉल में सब दरवाजे खिड़कियां खोलकर फुल वॉल्यूम के साथ देखा करते थे ताकि हॉस्टल के बाहर बनी पुलिस चौकी तक भी आवाज पहुंच जाए।
ये था हमारा प्रतिरोध जनरल जिया-उल-हक की तानाशाही के खिलाफ। कभी-कभी पुलिसवाले दबी-दबी जबान में हंसते हुए कहते, 'हम तुम्हारी भावनाएं समझते हैं, लेकिन आवाज थोड़ी कम कर लिया करो, कभी कोई टेढ़ा अफसर आ गया तो हमारी पेटियां उतरते देखकर तुम्हें अच्छा लगेगा क्या?'
इन सिपाहियों की जगह हर तीन महीने बाद नए सिपाही आ जाते। पर एक सिपाही मुझे याद है, शायद जमील नाम था। स्पेशल ब्रांच का था इसलिए वर्दी नहीं पहनता था। हॉस्टल की चौकी पर एक साल से ज्यादा नियुक्त रहा।
जब उसने अपने ट्रांसफर का बताया तो हम चार-छह लड़कों ने कहा कि जमील आज तुम्हारी हॉस्टल की कैंटीन में दावत करते हैं। वह कहने लगा, दावत छोड़ो श्रीदेवी की कोई फिल्म दिखा दो। उस रात सिपाही जमील को सम्मान देने के लिए 'जस्टिस चौधरी' मंगवाई गई और पूरे सम्मान के साथ देखी गई।
आज मैं 30-35 साल बाद सोच रहा हूं कि अगर श्रीदेवी न होती तो जनरल जिया-उल-हक की 10 साल पर फैली घुप्प तानाशाही हम लड़के कैसे काटते। मैंने श्रीदेवी की आखिरी फिल्म 'चांदनी' देखी, जिंदगी फिर जाने कहां से कहां ले गई।
श्रीदेवी को भी शायद पता चल गया था, इसलिए 90 के दशक में वो भी शाम के सूरज की तरह आहिस्ता-आहिस्ता नजरों से ओझल होती चली गईं। मैंने सुना की 'इंग्लिश-विंग्लिश' बहुत अच्छी फिल्म थी, फिर सुना कि 'मॉम' में श्रीदेवी ने कमाल का काम दिखाया। मगर कल तो श्रीदेवी ने कमाल ही कर दिया, मगर न मुझे कोई दुख है न हैरत।
वैन गॉग के बारे में सुना है कि जब उन्हें अपनी कोई पेंटिंग बहुत ज्यादा अच्छी लगने लगती तो वो उसे फाड़ दिया करते थे। कल भी शायद यही हुआ श्रीदेवी की पेंटिंग शायद बनाने वाले को ज्यादा ही भा गई।