फ्रांसीसी लेखक मिलान कुंदेरा ने सत्ता के खिलाफ आदमी के संघर्ष को भूलने के खिलाफ याद रखने का संघर्ष बताया था। पर इमरजेंसी को याद रखने के लिए हमने क्या किया?
क्या हिंदुस्तान में कहीं कोई म्यूजियम, कोई आर्ट गैलरी या कोई और यादगार मौजूद है जो बताता हो कि किस तरह इमरजेंसी में इंदिरा गांधी ने विपक्षी राजनीतिक पार्टियों पर पाबंदी लगाकर उनके बड़े नेताओं को रातों रात जेल में ठूंस दिया और फिर अगले 19 महीने तक देश में सेंसरशिप और खौफ का साया हर जगह पसर गया?
इमरजेंसी का जिक्र किताबों और फिल्मों में तो आता है लेकिन जहां तक मैं जानता हूं भारतीय इतिहास के इस काले अध्याय को नई पीढ़ियों की स्मृति में ताजा बनाए रखने के लिए किसी सार्वजनिक जगह पर आपातकाल की याद को समर्पित कोई संग्रहालय या स्मृतिचिह्न मौजूद नहीं है।
पाकिस्तानी संसद भवन
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जो पार्टियां कांग्रेस को घेरने के लिए बार-बार इमरजेंसी का हवाला देती हैं, उन्होंने भी जनतंत्र को फिर से हासिल करने के लिए 19 महीने के संघर्ष को सिर्फ सेमिनारों में ही याद किया है। पाकिस्तान के इतिहास में भारत के मुकाबले ज्यादा स्याह पन्ने हैं।
भारत में अगर एक बार 19 महीने के लिए तानाशाही का सितम बरपा तो सत्तर बरस के इतिहास में पाकिस्तान की जनता ने तीन बार सीधे और एक बार परोक्ष रूप में फौजी शासन की ठंडी नाल अपनी गर्दन पर महसूस की है। फिर भी पाकिस्तान ने अपने इतिहास के उन स्याह पन्नों को मोड़कर किन्हीं गुप्त तहखानों में गुम नहीं होने दिया बल्कि राजधानी इस्लामाबाद में ऐन संसद की इमारत के बाहर और भीतर इन यादों को पत्थरों और दीवारों पर उकेर दिया है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें कि उनका मुल्क किस दौर से गुजरा।
काले रंग की चौड़ी पट्टियाँ
इस्लामाबाद में पाकिस्तानी सीनेट की इमारत के बाहर भित्तिचित्रों के ज़रिये बताया गया है कि किस तरह उस मुल्क में हर दौर में नागरिक अधिकार, बोलने की आज़ादी और जनतांत्रिक अधिकारों पर हमला हुआ और किस तरह आम लोगों -वकीलों, छात्रों, मज़दूरों, किसानों और कवियों-लेखकों ने लोकतंत्र के पक्ष में और तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।
सीनेट की इमारत के अंदर गली-ए-दस्तूर है। ये एक साधारण सा गलियारा है लेकिन यहां पहुंचकर लगता है जैसे वामपंथी विचारधारा से प्रभावित किसी आर्ट गैलरी में आ गए हों। इस गलियारे की दीवार पर पिछले सत्तर बरस में लोकतंत्र को बचाने की जद्दोजहद की कहानी बयान की गई है। गली-ए-दस्तूर को बने एक साल हो चुका है। जिस शख़्स ने संसद के भीतर कला के जरिए लोकतंत्र और संविधान को बचाने की लड़ाई को उकेरने का फैसला किया वो हैं पाकिस्तानी सीनेट के चेयरमैन मियां रज़ा रब्बानी।
लोकतंत्र की लड़ाई
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के वरिष्ठ नेता रजा रब्बानी को जनतंत्र के प्रबल समर्थक, बुद्धिजीवी और लेखक के तौर पर जाना जाता है। वो अपने छात्र जीवन से ही वामपंथी नजरिए के संपर्क में आए। जिया उल-हक के मार्शल लॉ के दौरान उन्हें जेल में डाल दिया गया था। जो देश चार-चार बार फौजी शासन का स्वाद चख चुका हो और जहां अब भी फौज सर्वशक्तिशाली मानी जाती हो, वहां संसद के भीतर कला के जरिए लोकतंत्र की लड़ाई के इतिहास को दर्ज करना मामूली बात नहीं है।
रज़ा रब्बानी ने इस काम में पाकिस्तान के नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स (एनसीए) के छात्रों और डायरेक्टर डॉक्टर नदीम उमर तरार की मदद ली। गली-ए-दस्तूर को दूर से देखने पर चार काले रंग की चौड़ी पट्टियां नजर आती हैं। ये काली पट्टियां जनतंत्र को स्थगित करने और फौजी शासन कायम किए जाने का प्रतीक हैं। इनमें कांटेदार तारों के पीछे उस दौर के अखबारों की सुर्खियों को नुमाया किया गया है।
शायरों की तस्वीरें भी...
पाकिस्तान के गलियारे में पहली काली पट्टी आज़ादी के 11 बरस बाद यानी 1958 में ही आ गई थी जब रिटायर्ड मेजर-जनरल इस्कंदर मिर्ज़ा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को बेदखल करके सत्ता अपने हाथ में ले ली और जनरल अयूब खान को मार्शल लॉ प्रशासक बना दिया। फिर 1977 में जनरल ज़िया उल-हक ने प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को सत्ता से हटाकर फाँसी पर चढ़ा दिया।
ज़िया उल-हक की विमान दुर्घटना में मौत के बाद फौज के करीबी समझे जाने वाले गुलाम इसहाक खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनाए गए जिन्होंने नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो की सरकारों को बर्खास्त किया।
फिर 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने मियाँ नवाज शरीफ की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करके सत्ता अपने हाथ में ले ली। गली-ए-दस्तूर में फैज अहमद फैज, हबीब जालिब, जॉन एलिया, अहमद फराज जैसे शायरों की तस्वीरें और भित्तिचित्र उकेरे गए हैं।
आजादी के गीत
ये वो शायर थे जिन्होंने पाकिस्तान में किसानों-मजदूरों, छात्रों, खेतिहरों, वकीलों, बुद्धिजीवियों, शायरों और लेखकों की आज़ादी के गीत गाए थे। हबीब जालिब ने लिखा था —
"दीप जिस का महलात ही में जले,
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले,
वो जो साए में हर मस्लहत के पले,
ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।"
फौजी हुकूमत के खिलाफ फैज अहमद फ़ैज की नज़्म सीमा के आर-पार आज भी गाई जाती है — "निसार मैं तिरी गलियों पे ऐ वतन कि जहाँ, चली है रस्म कि कोई न सिर उठा के चले। जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले, नजर चुरा के चले, जिस्मो-जाँ बचा के चले।"
लोकतंत्र की लड़ाई
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इन शायरों के जरिए पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली के लिए लड़ने वाले राजनेताओं ने एक ऐसे स्पेस का निर्माण किया है जिसमें एक पक्ष में संविधान और कानून के शासन पर यकीन करने वाले छात्र, वकील, किसान, महिलाएं, राजनीतिक कार्यकर्ता, शायर और लेखक हैं तो उनके खिलाफ दूसरे पक्ष में फौजी बूट पहनें, बंदूकों के जरिए जनता की आवाज को कुचलने वाले जनरल।
लौटते हैं हिंदुस्तान की ओर...
इमरजेंसी का विरोध करने के लिए रिक्शे पर चढ़कर पटना की सड़कों पर वैद्यनाथ मिश्र 'नागार्जुन' गाते फिरते थे — "इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको, सत्ता के नशे में भूल गईं बाप को"। उन्होंने खुलेआम सत्ता की बंदूक को ललकारा:
"खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक"
बाबा नागार्जुन की ये कविता या उनकी कोई तस्वीर आपको हिंदुस्तान में किसी चौराहे या सरकारी इमारत में लिखी हुई नजर आती है? क्या कभी कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में विशाल पत्थर गाड़कर उस पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये कविता उकेरी जा सकेगी —
"यह जो छापा तिलक लगाए और जनेऊधारी है
यह जो जात पांत पूजक है यह जो भ्रष्टाचारी है
यह जो भूपति कहलाता है जिसकी साहूकारी है
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है."
क्या अमृतसर या चंडीगढ़ के किसी चौराहे पर अवतार सिंह पाश की ये पंक्तियाँ किसी फव्वारे के पानी से भीगती मिलेंगी —
"सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होनासब कुछ सहन कर जाना…
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।"
पाकिस्तान ने तो ऐन अपनी संसद के भीतर गली-ए-दस्तूर में फैज अहमद फ़ैज, हबीब जालिब और जॉन एलिया जैसे अपने शायरों को इज़्ज़त बख़्श दी है। अपने कवियों-शायरों की जलाई मशाल की रोशनी में क्या भारत भी कभी आगे का रास्ता तलाशना शुरू करेगा या यहां के जनतंत्र में नागार्जुन, सर्वेश्वर और पाश जैसे कवियों से हुक्मरान हमेशा डरते ही रहेंगे?