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क्या सेना ने पाकिस्तान को मुसीबत से निकाला है?

Sun, 03 Dec 2017 02:53 PM IST
इकबाल अहमद/बीबीसी हिंदी
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- फोटो : bbc
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पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ्ते धार्मिक गुट तहरीक-ए-लब्बैक या रसूलुल्लाह (टीएएल) के धरना प्रदर्शन को बलपूर्वक खत्म कराने के बाद पैदा हुए हालात से जुड़ी खबरें सबसे ज़्यादा चर्चा में रहीं।
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पाकिस्तान के एक धार्मिक गुट टीएएल के लगभग तीन हजार कार्यकर्ता राजधानी इस्लामाबाद के फ़ैजाबाद इंटरचेंज पर छह नवंबर से धरने पर बैठे थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि चुनाव सुधार के नाम पर संसद में जो संशोधन बिल पेश किया गया था उससे इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं का उल्लंघन होता था। 

पाकिस्तानी कानून के अनुसार चुनाव में भाग लेने वाले किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को ये हलफ़नामा देना होता है कि पैग़म्बर मोहम्मद इस्लाम के आखिरी पैग़म्बर हैं और अब उनके बाद कोई दूसरा पैगम्बर नहीं आएगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संशोधन के लिए पेश किए गए बिल में इस हलफनामे की शर्तों के साथ छेड़छाड़ की गई थी जिसे वो किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे।
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धरने प्रदर्शन को शांतिपूर्वक तरीके से ख़त्म कराने के तमाम प्रयासों के विफल होने के बाद आख़िरकार सरकार ने पिछले शनिवार यानी 25 नवंबर को बल प्रयोग किया था जिसमें कई लोग मारे गए थे। आख़िरकार सेना की मदद से प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच 27 नवंबर को समझौता हुआ और धरने को पूरी तरह से समाप्त घोषित कर दिया गया। 

सेना की भूमिका
सरकार और टीएएल के बीच छह मुद्दों पर समझौता हुआ था। समझौते की शर्तों के अनुसार कानून मंत्री ज़ाहिद हामिद ने अपना इस्तीफा दे दिया था। धार्मिक संगठन उनके खिलाफ कोई फ़तवा नहीं जारी करेगी। हलफ़नामे में गड़बड़ी की जांच के लिए गठित राजा ज़फ़रुल हक़ कमेटी की रिपोर्ट 30 दिनों के अंदर सार्वजनिक कर दी जाएगी।

हलफनाम के साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। गिरफ़्तार किए गए सभी लोगों की रिहा कर दिया गया और जो भी आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी भरपाई केंद्र और राज्य सरकारें करेंगी। लेकिन सेना के रोल को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. कुछ लोग सेना के हस्तक्षेप का स्वागत कर रहे हैं तो कई लोग सेना की मध्यस्थता की आलोचना कर रहे हैं। 

कई समाचार चैनलों पर कई राजनीतिक विश्लेषकों ने सेना के रोल की जमकर आलोचना की। लेकिन अदालत सेना के साथ खड़ी दिख रही है। अख़बार जंग के अनुसार लाहौर उच्च न्यायालय ने सेना के रोल की सराहना की है। अख़बार के अनुसार लाहौर उच्च न्यायालय का मानना है कि सेना ने मुसीबत से निकाला है और अगर सेना वो किरदान न अदा करती तो पता नहीं कितनी लाशें गिरतीं।

लाहौर हाईकोर्ट के जस्टिस क़ाज़ी मोहम्मद अमीन अहमद ने तंज़ करते हुए कहा, ''अगर कोई नागरिक लापता है तो उसकी तलाश के लिए हमें पाकिस्तान की संस्थाओं को ही आदेश देना होगा, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ को नहीं।''
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शीर्ष अदालत की फटकार

अदालत। - फोटो : amar ujala
पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार पर जमकर हमला किया। राजधानी इस्लामाबाद में ग़ैर-क़ानूनी इमारतों को हटाने के लिए सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने सरकार को निशाना बनाया। अख़बार जंग के अनुसार जस्टिस अज़मत सईद ने तंज करते हुए कहा, ''ग़ैर-कानूनी इमारतों को हटाने के लिए भी अब सरकार क्या किसी से समझौता करेगी।

आखिर में आप कहेंगे कि यहां पर भी सेना बुला दें। उम्मीद है मेरी अनकही बात समझ गए होंगे।'' अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कुछ लोग निजी स्वार्थ के लिए सेना को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। 

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस फ़ायज़ ईसा के हवाले से अख़बार लिखता है, ''सियासत के अलावा मुल्क के लिए भी सोच लिया करें। मुफ़्त में मिली आज़ादी को तबाह न करें। आज़ादी की क़द्र रोहिंग्या मुसलमानों से पूछें।'' कुछ मीडिया चैनलों की रिपोर्टिंग पर भी अदालत ने जमकर खरी खोटी सुनाई। अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार सुप्रीम कोर्ट का कहना था, ''क्या बिस्कुट के विज्ञापन के पीछे अपना ईमान बेच देंगे। ज़ुबान का इस्तेमाल हथियार के तौर पर हो रहा है। अगर मीडिया शांति और भाईचारे की बात नहीं कर सकती तो बेहतर है, हम उसके बग़ैर रहें।''

अख़बार दुनिया के अनुसार सेना के रोल का समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेना भी सरकार का एक हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ये बात ग़लत है कि सेना सरकार से अलग है और अगर धरने को समाप्त कराने के लिए किसी ने कोई रोल अदा किया है तो ये अच्छी बात है। विपक्षी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने भी मौजूदा घटनाक्रम के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। 

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार पीपीपी के गठन के 50 साल पूरे होने के अवसर पर कराची में कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ने भी हिस्सा लिया। अख़बार के अनुसार इस अवसर पर पार्टी को संबोधित करते हुए बिलावल भुट्टो का कहना था, ''पिछले कुछ दिनों में मुल्क में जो कुछ भी हुआ, उसमे सरकार को घुटने टेकते हुए देखा। इस मामले से जुड़े सभी लोगों से अपील करते हैं कि लोकतंत्र को चलने दें।''
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