पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ्ते धार्मिक गुट तहरीक-ए-लब्बैक या रसूलुल्लाह (टीएएल) के धरना प्रदर्शन को बलपूर्वक खत्म कराने के बाद पैदा हुए हालात से जुड़ी खबरें सबसे ज़्यादा चर्चा में रहीं।
पाकिस्तान के एक धार्मिक गुट टीएएल के लगभग तीन हजार कार्यकर्ता राजधानी इस्लामाबाद के फ़ैजाबाद इंटरचेंज पर छह नवंबर से धरने पर बैठे थे। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि चुनाव सुधार के नाम पर संसद में जो संशोधन बिल पेश किया गया था उससे इस्लाम की बुनियादी मान्यताओं का उल्लंघन होता था।
पाकिस्तानी कानून के अनुसार चुनाव में भाग लेने वाले किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार को ये हलफ़नामा देना होता है कि पैग़म्बर मोहम्मद इस्लाम के आखिरी पैग़म्बर हैं और अब उनके बाद कोई दूसरा पैगम्बर नहीं आएगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संशोधन के लिए पेश किए गए बिल में इस हलफनामे की शर्तों के साथ छेड़छाड़ की गई थी जिसे वो किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे।
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धरने प्रदर्शन को शांतिपूर्वक तरीके से ख़त्म कराने के तमाम प्रयासों के विफल होने के बाद आख़िरकार सरकार ने पिछले शनिवार यानी 25 नवंबर को बल प्रयोग किया था जिसमें कई लोग मारे गए थे। आख़िरकार सेना की मदद से प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच 27 नवंबर को समझौता हुआ और धरने को पूरी तरह से समाप्त घोषित कर दिया गया।
सेना की भूमिका
सरकार और टीएएल के बीच छह मुद्दों पर समझौता हुआ था। समझौते की शर्तों के अनुसार कानून मंत्री ज़ाहिद हामिद ने अपना इस्तीफा दे दिया था। धार्मिक संगठन उनके खिलाफ कोई फ़तवा नहीं जारी करेगी। हलफ़नामे में गड़बड़ी की जांच के लिए गठित राजा ज़फ़रुल हक़ कमेटी की रिपोर्ट 30 दिनों के अंदर सार्वजनिक कर दी जाएगी।
हलफनाम के साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। गिरफ़्तार किए गए सभी लोगों की रिहा कर दिया गया और जो भी आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी भरपाई केंद्र और राज्य सरकारें करेंगी। लेकिन सेना के रोल को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. कुछ लोग सेना के हस्तक्षेप का स्वागत कर रहे हैं तो कई लोग सेना की मध्यस्थता की आलोचना कर रहे हैं।
कई समाचार चैनलों पर कई राजनीतिक विश्लेषकों ने सेना के रोल की जमकर आलोचना की। लेकिन अदालत सेना के साथ खड़ी दिख रही है। अख़बार जंग के अनुसार लाहौर उच्च न्यायालय ने सेना के रोल की सराहना की है। अख़बार के अनुसार लाहौर उच्च न्यायालय का मानना है कि सेना ने मुसीबत से निकाला है और अगर सेना वो किरदान न अदा करती तो पता नहीं कितनी लाशें गिरतीं।
लाहौर हाईकोर्ट के जस्टिस क़ाज़ी मोहम्मद अमीन अहमद ने तंज़ करते हुए कहा, ''अगर कोई नागरिक लापता है तो उसकी तलाश के लिए हमें पाकिस्तान की संस्थाओं को ही आदेश देना होगा, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ को नहीं।''