तुर्की में सेना के एक धडे की तख्तापलट की नाकाम कोशिश में 265 लोग मारे गए हैं। पश्चिम एशिया मामलों के जानकार प्रोफेसर अश्विनी महापात्रा मानते हैं कि तुर्कों को धर्म के आधार पर नई पहचान देने का प्रयास वहां हुए संघर्ष का एक अहम कारण है। तख्तापलट की वजहों और परिणामों पर अश्विनी महापात्रा- "तुर्की में 1960, 1971, 1980 में जब पहले तख्तापलट हुआ, तब सैनिकों और सेनाध्यक्ष के बीच बहुत तालमेल के साथ ऐसा हुआ था।
तुर्की में 1920 के दशक से धर्मनिरपेक्ष देश बनाने का प्रयास हुआ। तुर्की में आज जो संघर्ष नजर आ रहा है वो दरअसल तुर्कों कोएक नई पहचान देने वाला वैचारिक संघर्ष है। तुर्की में पहले से ऐसे हालात बनने के संकेत थे। बीच-बीच में इस तरह के षड़यंत्र की अफवाहें भी आती रहती थीं।
इसकी सबसे बडी वजह यह है कि राष्ट्रपति अर्दोआन के सत्ता में आने के बाद ये वैचारिक संघर्ष शुरू हुआ है। आर्दोआन का समर्थन करने वाले लोग तुर्की के दक्षिणी हिस्से एनातोलिया से आते हैं। वहाँ उन्हें रूढ़िवादी मुसलमानों का समर्थन मिला था जिसके कारण वो राष्ट्रपति बने थे। आज तुर्क जहां है, वह ऑटोमन साम्राज्य का मध्य भाग हुआ करता था।