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'डर है तुर्की कहीं पाकिस्तान न बन जाए'

Sun, 17 Jul 2016 04:15 PM IST
बीबीसी
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- फोटो : Reuters
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तुर्की में सेना के एक धडे की तख्तापलट की नाकाम कोशिश में 265 लोग मारे गए हैं।  पश्चिम एशिया मामलों के जानकार प्रोफेसर अश्विनी महापात्रा मानते हैं कि तुर्कों को धर्म के आधार पर नई पहचान देने का प्रयास वहां हुए संघर्ष का एक अहम कारण है। तख्तापलट की वजहों और परिणामों पर अश्विनी महापात्रा- "तुर्की में 1960, 1971, 1980 में जब पहले तख्तापलट हुआ, तब सैनिकों और सेनाध्यक्ष के बीच बहुत तालमेल के साथ ऐसा हुआ था।
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तुर्की में 1920 के दशक से धर्मनिरपेक्ष देश बनाने का प्रयास हुआ। तुर्की में आज जो संघर्ष नजर आ रहा है वो दरअसल तुर्कों कोएक नई पहचान देने वाला वैचारिक संघर्ष है। तुर्की में पहले से ऐसे हालात बनने के संकेत थे। बीच-बीच में इस तरह के षड़यंत्र की अफवाहें भी आती रहती थीं।

इसकी सबसे बडी वजह यह है कि राष्ट्रपति अर्दोआन के सत्ता में आने के बाद ये वैचारिक संघर्ष शुरू हुआ है। आर्दोआन का समर्थन करने वाले लोग तुर्की के दक्षिणी हिस्से एनातोलिया से आते हैं। वहाँ उन्हें रूढ़िवादी मुसलमानों का समर्थन मिला था जिसके कारण वो राष्ट्रपति बने थे। आज तुर्क जहां है, वह ऑटोमन साम्राज्य का मध्य भाग हुआ करता था।
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- फोटो : Reuters
कमाल मुस्तफा अतातुर्क ने तुर्की को एक राष्ट्र के तौर पर पहचान दिलाई वो मानते थे कि एनातोलिया में जो लोग रहते हैं वो तुर्क हैं और वो सब धर्मनिरपेक्ष हैं। इसके बाद इस्लाम से उनका नाता लगभग टूट गया। फिर अस्सी साल तक तो कोई खास दिक्कत नहीं हुई लेकिन आर्दोआन ने आने के साथ ही कहा कि ये धर्मनिरपेक्षता ठीक नहीं है। 'हम' अपनी पहचान इस्लाम के आधार पर बनाएंगे। सेना तुर्की की धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा आधार है। वहां इसके तीन आधार माने जाते है- सेना, न्यायपालिका और उच्च शिक्षा।

यही वजह है कि तुर्की में तीन बार सेना की ओर से तख्तापलट हो चुका है। अतातुर्क भी एक फौजी अधिकारी थे इसलिए सेना के लोग सोचते हैं कि अतातुर्क ने एक धर्मनिरपेक्ष तुर्की बनाया था इसलिए उनका कर्तव्य है कि इस छवि को बनाकर रखा जाए। कुर्द अलगाववाद को रोकने में सरकार की नाकामी भी इसकी एक बड़ी वजह है।

इस बीच तुर्की के सामने जो सबसे बडी चुनौती है, वो यह है कि वहां धर्मनिरपेक्षता बचेगी या फिर इस्लामी कट्टरपंथ बढेगा। मुझे डर है कि तुर्की कहीं पाकिस्तान न बन जाए। इससे सबसे बडा खतरा वहाँ के गैर-सुन्नी अल्पसंख्यकों को होगा।"
(प्रोफेसर अश्विनी महापात्रा से बीबीसी हिंदी फेसबुक पर संवाददाता पंकज प्रियदर्शी की बातचीत पर आधारित)
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