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पाक चुनाव, कितना जानते हैं आप?

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पाकिस्तान के 66 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी गई किसी सरकार ने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया।
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पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार ने अपने प्रधानमंत्री ज़रूर बदले लेकिन सरकार पर किसी तरह का संकट नहीं आया और नेश्नल एसेंबली को समय से पहले भंग नहीं किया गया जैसा कि पाकिस्तान में अब तक होता आया था।

अब 11 मई को नेश्नल एसेंबली और प्रांतीय एसेंब्लियों के लिए चुनाव होने वाले हैं। चुनाव से जुड़े कुछ अहम सवाल।

ये चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं?

ये चुनाव पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए शायद सबसे बड़ी परीक्षा है। इन चुनावों के बाद नए प्रधानमंत्री और चारों प्रांतों के मुख्यमंत्रियों का चयन होगा। इसके अलावा इसी चुनाव से मौजूदा राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की क़िस्मत का भी फ़ैसला होगा जिनका कार्यकाल साल 2013 के अंत में समाप्त होने वाला है।
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पाकिस्तान में राष्ट्रपति का चुनाव नेश्नल एसेंबली, ऊपरी सदन सिनेट, चारों प्रांतीय एसेंबली के सदस्य करते हैं।

मुख्य पार्टियां कौन-कौन सी हैं?

राष्ट्रपति ज़रदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) पिछली केंद्रीय सरकार की सबसे बड़ी पार्टी थी। जबकि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग(नून) और पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान के नेतृत्व वाली तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टियां हैं।

पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क़ायदे आज़म) पिछली गठबंधन सरकार में शामिल थी और इन चुनावों में उसने पंजाब में पीपीपी से साथ अनौपचारिक गठबंधन कर रखा है।

कराची और हैदराबाद के शहरी इलाक़ों में ताक़तवर समझी जाने वाली मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट(एमक्यूएम) केंद्र और सिंध की प्रांतीय सरकार में पीपीपी की सहयोगी पार्टी है। लेकिन इस बार उसने चारों प्रांतों में अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं और उसने कोई चुनावी गठबंधन नहीं किया है।

अवामी नेश्नल पार्टी(एएनपी) भी केंद्र और ख़ैबर पख्तूख्वाह प्रांत में पीपीपी गठबंधन सरकार में सहयोगी है लेकिन वो भी इन चुनावों में अकेले लोगों का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही है।

धार्मिक पार्टियों का रूख़ क्या है?

बहुत सारी धार्मिक पार्टियों ने देश के कई हिस्सों में अपने-अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं।

जमीयत-उलेमा-इस्लाम(फ़ज़ल) एक दक्षिणपंथी पार्टी है जो वैचारिक रूप से देवबंदी या सलफ़ी इस्लाम के बहुत क़रीब है। पिछली संसद में उसकी आठ सींटें थीं जबकि ऊपरी सदन में उसके सात सदस्य हैं।
जमीयत-उलेमा-इस्लाम इस चुनाव में सबसे प्रमुख धार्मिक पार्टी शुमार की जा रही है।

जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान की सबसे पुरानी धार्मिक पार्टी है। उसने 2008 चुनाव का बहिष्कार किया था क्योंकि उस समय पूर्व सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ़ सत्ता में थे। लेकिन इस बार उसने पंजाब, ख़ैबर पख़्तूख़्वाह और सिंध में अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं।

पांच धार्मिक पार्टियों ने मिलकर मुत्तहिदा दीनी महाज़ नाम से एक गठबंधन बनाया है। उनमें से कुछ चरमपंथी संगठनों की प्रतिनिधि भी मानी जाती हैं।

इन चुनावों में मुख्य मुद्दे क्या हैं?

इन चुनावों में कोई एक ऐसा मुद्दा नहीं है जो सारे चुनावों को प्रभावित कर सकें।

नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल(नून) और इमरान ख़ान की पार्टी ने मौजूदा सरकार के भ्रष्टाचार और बिजली की क़िल्लत को प्रमुख मुद्दा बनाया है, जबकि धार्मिक पार्टियां पाकिस्तान में अमरीका की तरफ़ से हुए ड्रोन हमलों को चुनावी मुद्दा बना रही हैं।

चुनावी सभाओं और टीवी पर बहस के दौरान हिंसा को रोकने के लिए तालिबान चरमपंथियों से बातचीत के मुद्दे को भी काफ़ी जगह मिल रही है।

क्या चुनाव निष्पक्ष होंगे?

पाकिस्तान की आम जनता में इन चुनावों को लेकर काफ़ी उत्साह और उम्मीदें हैं। पहली बार एक शक्तिशाली चुनाव आयोग चुनाव करवा रहा है जिसके गठन में सत्ता और विपक्ष में सहमति बन पाई थी।

अभी तक इस चुनाव आयोग की निष्पक्षता के बारे में किसी भी पार्टी ने उंगली नहीं उठाई है।

लेकिन चरमपंथी हिंसा बहुत बड़ी चिंता का विषय है। पीपीपी, एमक्यूएम और एएनपी के उम्मीदवार और उनके समर्थकों को चरमपंथी अपने हमलों का निशाना बना रहे हैं।

इन पार्टियों ने हिंसा पर क़ाबू पाने मे असफल रहने के लिए सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी को भी चुनावी मुद्दा बनाया है।

अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के लिए इन चुनावों के क्या अर्थ हैं?

अफ़ग़ानिस्तान में नेटो सेना की मौजूदगी, अगले साल उनकी वापसी तथा इस पूरे आतंकविरोधी अभियान में पाकिस्तान की भूमिका को अंतरराष्ट्रीय समुदाय बहुत ध्यान से देख रहा है।
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यूरोपीय संघ ने पाकिस्तान में चुनावों के लिए अपने 110 पर्यवेक्षक भेजे हैं। अमेरिका के नेश्नल डेमोक्रेटिक इंस्टिच्यूट भी 57 पर्यवेक्षकों को भेजने की तैयारी कर रहा है।

अमेरिका, जापान और तुर्की सहित बहुत सारे देश भी अपने पर्यवेक्षकों को पाकिस्तान भेजने पर विचार कर रहे हैं।
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