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ब्लॉग: पाकिस्तान में एम्बेसडर का वो जमाना..

Sat, 18 Feb 2017 02:41 PM IST
वुसतुल्लाह ख़ान पाकिस्तान / बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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मेरी पीढ़ी चिट्ठी लिखती थी, चिट्ठी भेजती थी। इश्क भी चिट्ठी से शुरू होता था और खत्म भी चिट्ठी पर। चिट्ठी आई है, वतन से चिट्ठी आई है, ये सुनकर आंखें तर होना, कल की ही तो बात है।डाक बाबू जैसे हमारे परिवार का हिस्सा था। और फिर वो टेलिग्राफ ऑफिस का तार बाबू। हर छोटे शहर और कस्बे का पत्रकार सब पर धौंस जमाता था, मगर तार बाबू को आते-जाते सलाम करना नहीं भूलता था।
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  रोज अखबार के दफ्तर को गांव की खबर भी तो यही तार बाबू टकटक करके भेजता था। महबूबा चूंकि दुनिया की नजर में आए बगैर तार घर तक नहीं जा सकती थीं, इसलिए चिट्ठी में ही लिख भेजती थीं कि इस चिट्ठी को तार समझना।

फिर भी सब ये दुआ करते थे कि ऊपरवाला किसी के घर तार नहीं भेजे। चूंकि तार भेजने का निन्यानबे फीसदी मतलब यही था कि या तो मामा जी स्वर्ग सिधार गए या फिर ताऊ जी आखिरी सांसे ले रहे हैं या फिर छोटू का एक्सीडेंट हो गया है।शादी के न्यौते कम ही तार किए जाते थे। 
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पहले टैक्सी ही कहां चलती थी ?

यदि बात करें टैक्सी की तो  टैक्सियां ही कहां थीं? हमने तो तांगा ही पक्की सड़क पर खटपट-खटपट करते देखा। धनवान लोग अपनी हैसियत दिखाने के लिए और लुच्चे शोहदे ईद दिवाली पर तमाशाबीनी के लिए सालिम तांगा करते थे।और पैदल चलने वाले को यूं देखते थे जैसे सिंकदर ने पोरस को देखा होगा। बसंती तक तांगा चलाती थी, वरना शोले कहां चलती?

तांगा अड्डा शहर के बीचोंबीच होता था। मंटो ने तो अपने अफसाने 'नया कानून' की हीरोइन को तांगा लाइसेंस नहीं मिलने पर ऐसा बवाल मचाया कि आज तक 'नया कानून' उर्दू साहित्य की एमए की क्लासों में पढ़ाया जाता है।शहर की गोरी कई बार किसी वीरान रेलवे स्टेशन पर खड़े तांगे वाले से फिल्मी इश्क भी कर बैठती थी और तांगे वाला घोड़े को सड़ाक-सड़ाक चाबूक मारता, उसे दुनिया से दूर ले जाता।

फिर वो मोरस टैक्सी। आदमी रावलपिंडी के रेलवे स्टेशन पर उतरे और मोरस की काली-पीली टैक्सी में नहीं बैठे। 25 साल तक मोरस टैक्सी ने पिंडी पर राज किया वरना तो पिंडी ही पाकिस्तान पर राज करता आया है। और फिर एम्बैसडर कार। हमने तो इसे फिल्मों में ही चलते देखा। सफेद झक कुर्ते-धोती और नेहरू टोपी में सफेद एम्बैसडर से उतरते हुए खुर्राट नेता या फिर अमरीश पुरी और जोरावर चौधरी जैसे डॉन और स्मगलर। सब एम्बैसडर ही तो रखते थे।
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देखिए कैसे बिक गई एम्बेसडर कार।

दूसरी कोई भी कार रखने वाले के बारे में कहा जाता था- खानदानी नहीं है, नया नया पैसा आया है ना। फिर खत और टेलीग्राफ को ईमेल, तांगा अड्डे को प्लाजा, तांगे को टैक्सी और टैक्सी को नवाज शरीफ की पीली कार स्कीम खा गई।एम्बेसडर को भारत में आने वाली लिबरलाइजेशन और लिबरलाइजेशन के लिए मल्टीनेशनल ब्रांड्स की होड़ खा गई

कल खबर पढ़ी कि एम्बेसडर कार के ब्रांड को किसी फ्रेंच ऑटोमेकर को कुछ लाख डॉलर में बेच दिया गया। तो मुझे ये सब चीजें याद आ गईं जिन्हें अब मुझे अपने बच्चों को तस्वीर दिखाकर बताना होता है- ऐसा होता था टेलिग्राम, ऐसी वर्दी थी डाक बाबू की।ये है तांगा, इसमें घोड़ा आगे जोता जाता था। और ये है मोरस टैक्सी। आज केवल एक टैक्सी बाकी है और वो भी इस्लामाबाद के लोकवर्षा म्यूजियम में।

क्या कोई तरीका है अपनी यादों को ओएलएक्स पर बेचने का?
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