पाकिस्तान भले ही परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों द्वारा परमाणु अप्रसार संधि से नहीं जुड़े देशों की सदस्यता पर बनने वाले मापदंडों के प्रति खुशी जता रहा है, लेकिन उसे डर है कि बड़े ताकतवर राष्ट्रों के दबाव में छोटे देशों की सदस्यता में छूट कहीं भारत को एनएसजी में प्रवेश का रास्ता न दिखा दे। उसे महसूस हो रहा है कि दक्षिण एशिया में रणनीतिक बराबरी के लिए भारत के समकक्ष होने के उसके आवेदन को भी अनदेखा किया जाएगा।
पाक अखबार ‘डॉन’ ने पाकिस्तानी अधिकारियों के हवाले से शक जताया है कि दुनिया के बड़े शक्तिशाली देश अपने छोटे सहभागियों पर दबाव बनाकर भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता के लिए समर्थन दिला सकते हैं।
इसके लिए उसे आशंका है कि एनएसजी द्वारा बनाए गए नए मापदंडों को भी दरकिनार किया जा सकता है। पाक विदेश विभाग में निरस्त्रीकरण के डायरेक्ट जनरल कामरान अख्तर ने यहां आयोजित एक कार्यशाला में कहा कि - ‘हमें उम्मीद है कि एनएसजी देश छूट के प्रवधानों में बदलाव नहीं करेंगे लेकिन वे भारत को छूट दे सकते हैं।’
कामरान अख्तर दक्षिण एशिया और सुरक्षा, निवारण विषय पर कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इसके प्रतिकूल परिणाम सिर्फ पाकिस्तान पर ही नहीं बल्कि ऐसे अन्य गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों पर भी पड़ेंगे जो चाहते हैं कि परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल शांति के अधिकार के लिए किया जाना चाहिए।
दोहरे व्यवहार वाले पाक को खुद के कमजोर होने का डर
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उन्होंने कहा कि कई देशों ने छूट देने के बजाय मानदंड आधारित दृष्टिकोण की जरूरत को मान्यता दी है लेकिन यह दबाव छोटे देशों का ध्यान अपनी तरफ खींच रहा है। यह कार्यशाला सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज और लंदन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई थी।
‘डॉन’ के मुताबिक पाकिस्तान में रणनीतिक योजना डिवीजन के डायरेक्टर जनरल खालिद बनूरी ने कहा कि पाक चाहता है कि भारत को युद्ध के लिए कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो पाकिस्तान बुरी हालत में आ सकता है।
जबकि पाक खुद के लिए हथियार इसलिए बनाना चाहता है ताकि क्षेत्र में शांति कायम रखी जा सके। दूसरी तरफ, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव तस्नीम आलम ने कहा कि वर्तमान में एनएसजी एक चौराहे पर खड़ा है जहां उसे गैर-परमाणु अप्रसार संधि वाले देशों की सदस्यता पर विचार करना है। ऐसे में भारत को सदस्यता मिल जाने से पाकिस्तान काफी कमजोर हो जाएगा।
भारत की सदस्यता पर बंटा हुआ था एनएसजी समूह
गत माह विएना में एनएसजी सदस्य 2016 में दूसरी बार मिले थे। इस दौरान यह सदस्य गैर-परमाणु अप्रसार संधि वाले देशों को एनएसजी में प्रवेश देने के मुद्दे पर कोई सहमति नहीं बना पाए थे। सभी सदस्य परमाणु अप्रसार नियमों के सख्ती से अनुपालन और भारत को तुरंत सदस्यता देने के मुद्दे पर बंटे हुए थे।
चीन लगातार एनएसजी पर भारत की सदस्यता का विरोध करता रहा है। चीन का प्रस्ताव है कि सदस्यता का चयन दो चरणों में होना चाहिए, जबकि अमेरिका समेत अन्य विकसित देश चाहते हैं कि भारत को सदस्यता नियमों से छूट मिलनी चाहिए।
इसलिए भारत की सदस्यता से डर रहा है पड़ोसी पाकिस्तान
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परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) का गठन भारत द्वारा 1974 में हुए परमाणु परीक्षण के ठीक बाद में हुआ था। यानी 1975 में एनएसजी का गठन भारत का विरोध करने के लिए हुआ था। ऐसे में यदि भारत को ही उसका सदस्य बना लिया जाता है तो यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि होगी।
हालांकि भारत को 2008 में ही परमाणु पदार्थों के आयात की सहूलियत पहले ही मिल चुकी है इसलिए पाक जानता है कि एनएसजी की सदस्यता से भारत को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होगा, लेकिन उसे डर है कि भारत का इससे रुतबा बढ़ेगा और वह अन्य सदस्यों के साथ मिलकर परमाणु संबंधी नियम बना सकेगा।