भारतीय रेलवे के 80 ट्रेनों और 74 रेलवे स्टेशनों पर किए गए एक सर्वे की रिपोर्ट से पता चला है कि रेल यात्रियों को जो खाना मिलता है वो अक्सर पुराना और बासी होता है। लिहाजा ये खाना मुसाफिरों की सेहत के लिए हानिकारक है। ऐसी फिजूल रिपोर्टों से बिल्कुल डरना नहीं चाहिए। न खाना पकाने वालों को, न खाना खाने वालों को। लगातार अच्छा खाना शरीर को हानिकारक कीटाणुओं से लड़ने के काबिल नहीं रहने देता। भोजन जितना बासी या सड़ा हुआ होगा, उतना ही एंटीबायोटिक होगा।
अब आप यही देखिए कि लगभग 90 वर्ष पहले एक स्कॉटिश डॉक्टर एलैक्जेन्डर फ्लेमिंग अगर अपनी लेबोरेटरी में डबल रोटी का छोटा सा टुकड़ा ना भूल जाते और इस टुकड़े पर कुछ दिनों में फफूंद न लग जाती, और इस फफूंद से आसपास के बैक्टीरिया मरने न शुरू हो जाते तो डॉक्टर फ्लेमिंग को इस फफूंद से पेन्सिलिन बनाने के ख्याल न आता और फिर पेन्सिलिन से एंटीबायोटिक का इंकलाब न आता और करोड़ो लोग आज भी सौ वर्ष पहले की तरह मामूली नजले जुकाम से मरते रहते।
साबित ये हुआ कि बासी या फफूंद लगा खाना एंटीबायोटिक होने के कारण उसे भगवान का प्रसाद समझिए। अब आप यही देखिए कि जब यूरोप और अमेरिका से एनआरआई या एनआरपी दिल्ली या लाहौर आते हैं तो कुछ पीते या खाते ही पेट पकड़ कर शौचालय की ओर दौड़ते हैं। मगर हम लोग यहां इंडिया पाकिस्तान में रहते हुए कुछ भी खा-पी लें हमारा पेट कोई नखरा ही नहीं करता- लक्कड़ हजम, पत्थर हजम।