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'मंगल पर रॉकेट भेजना हराम है या हलाल?'

Tue, 30 Sep 2014 12:57 PM IST
वुसतुल्लाह खान/बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
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मंगलयान ने पिछले मंगलवार को मंगल ग्रह के गले में जो मंगलसूत्र बांध दिया, उसके लिए पूरे भारतवासियों को बधाई हो।
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ज्यादातर पाकिस्तानियों ने इस सूचना को अच्छे से लिया है मगर कुछ शक्की शक भी कर रहे हैं कि भारत ने ये काम इतने सस्ते में कैसे कर लिया।

जबकि इससे दोगुनी कीमत पर तो लाहौर में जंगला बस का 27 किलोमीटर का प्रोजेक्ट मुकम्मल हुआ है।
वुसतुल्लाह खान का ब्लॉग

मैंने रेडियो पाकिस्तान के सामने की फुटपाथ पर जन्मों से तोता लेकर बैठने वाले जान मोहम्मद नजूमी से गंभीर सूरत बनाकर पूछा कि मंगल ग्रह पर मंगलयान उतरने से आपके काम पर तो असर नहीं पडे़गा?

'हराम या हलाल?'

जान मोहम्मद ने कहा कि अगर ये सच्ची खबर है तो फिर भारतीयों को किसी तरह रोको। क्योंकि मंगल बादशाह का गुस्सा मशहूर है।

उसके साथ छेड़मछाड़ी भली नहीं। मंगल बिगड़ गया तो बुध, शुक्र और शनि की चाल भी बिगाड़ देगा और ज्योतिष में बड़ी गड़बड़ी हो जाएगी।

इस दफा तो ठीक है पर अगली मंगल यात्रा ज्योतिषियों से पत्री निकलवाए बिना न भेजी जाए वरना वरुण ने अरुण के साथ मिलकर मंगल को कोई पट्टी पढ़ा दी तो फिर मंगल जो इस संसार के साथ करेगा, उसकी जिम्मेदारी ज्योतिषी जान मोहम्मद बिल्कुल नहीं लेगा।

पाकिस्तान में ये चर्चा भी हो रही है कि मंगल ग्रह पर रॉकेट भेजना 'हराम है या हलाल'?

क्योंकि पिछले साल ही खाडी़ के कुछ उलेमाओं ने फतवा दिया था कि हॉलैंड की संस्था 'मार्स-वन' साल 2022 में मंगल पर इंसान भेजने के लिए छह अरब डॉलर की जो परियोजना बना रही है, उसमें कोई मुसलमान भाग न ले।

क्योंकि एक ऐसे ग्रह पर जहां पानी तक न हो, वहां इंसान का एक तरफ का टिकट लेकर जाना आत्महत्या है और आत्महत्या इस्लाम में हराम है।

संयुक्त अरब अमीरात की सरकार को ये फतवा इतना पसंद आया कि उसने तुरंत घोषित कर दिया कि साल 2021 तक वो अपना पहला मिशन मंगल की ओर भेजेगी मगर इस मिशन में कोई मानव नहीं होगा।
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पाकिस्तान का स्पेस प्रोग्राम

कोई आत्महत्या हुई भी तो अंतरिक्ष यान की होगी जो हराम नहीं है। वैसे तो पाकिस्तान का स्पेस प्रोग्राम 'स्पार्को' भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम 'इसरो' से भी पांच साल पुराना है।

मगर स्पार्को के सयानों का ख्याल है कि 300 दिन के सफर करके ये देखने जाना कि मंगल खैरियत से है कि नहीं, सिवा शोबाजी के और क्या है।

इसीलिए स्पार्को ने इसरो से भी ज्यादा सस्ता और टिकाऊ तरीका ईजाद किया है। यानी मंगल देखने के लिए इतने ही मरे जा रहे हो तो दूरबीन से देख लो और रोजाना कई बार देख लो।

अब हिंद महासागर की गहराई मापने के लिए उसकी तह में उतरना जरूरी तो नहीं, वैसे भी किसी के यहां बिन बुलाए जाना अच्छी बात नहीं है। मंगलवासी हम पृथ्वीवासियों के बारे में क्या सोचेंगे।

अरे हां! ये तो बताइए कि पृथ्वी से मंगल ग्रह ज्यादा दूर है कि दिल्ली से इस्लामाबाद। सोच समझकर जवाब दीजिएगा।
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