पाकिस्तान में इमरान खान के समर्थकों में यह राय बनी है कि पूर्व प्रधानमंत्री को इस बात का अंदाजा नहीं था कि टकराव मोल लेने पर सत्ता किस हद तक उनका जीना मुहाल कर सकती है। पिछले अप्रैल में जब अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के कारण वे सत्ता से हटे, तब उन्हें अपनी लोकप्रियता पर भरोसा था। उनकी रैलियों में जुटी भारी भीड़ ने उनके इस यकीन को और मजबूत कर दिया कि जल्द ही उनकी सत्ता में वापसी हो जाएगी। लेकिन यही जन समर्थन अब उनकी मुश्किल बनता जा रहा है। उनकी लोकप्रियता से आशंकित प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने चुनाव से पहले ही इमरान खान का पर काट देने की कोशिश में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
पाकिस्तान इस भीषण प्राकृतिक आपदा का सामना कर रहा है। देश का लगभग हर प्रांत भारी बारिश और बाढ़ की मार से पीड़ित है। लगभग डेढ़ हजार लोगों की जान चुकी है। सरकारी अनुमान है कि बाढ़ के कारण देश को चार बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। ये क्षति उस समय हुई है, जब देश पहले से ही गहरे आर्थिक संकट में है। इस बदहाली के कारण पाकिस्तान सरकार को अंतरराष्ट्रीय मदद की गुहार लगानी पड़ी है। लेकिन पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस संकट के बीच भी सरकार ने इमरान खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पर निशाना साधे रखा है।
विश्लेषकों ने राय जताई है कि पिछले अप्रैल में सरकार गिराने के बाद इमरान खान ने इस घटनाक्रम के पीछे विदेशी साजिश के आरोप लगाए। उनका इल्जाम है कि विपक्षी नेताओं ने अमेरिकी साजिश के तहत उनकी सरकार गिराई। इस सिलसिले में उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि देश के शक्तिशाली एस्टैब्लिशमेंट (सेना और खुफिया तंत्र) ने इस साजिश को कामयाब होने दिया। तब से यह उनका मुख्य मुद्दा रहा है। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इस आरोप से इमरान खान ने सत्ता के ताकतवर केंद्रों को अपने खिलाफ कर दिया।
इमरान खान के खिलाफ शहबाज शरीफ सरकार ने आतंकवाद के आरोप में मुकदमा दर्ज किया है। अभी अग्रिम जमानत के तहत सितंबर के पहले हफ्ते तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगी हुई है। लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि कोर्ट का संरक्षण जैसे ही खत्म होगा, शरीफ सरकार उन्हें जेल मे डाल देगी। इसकी उसने पूरी तैयारी कर रखी है। पीटीआई के नेता शहबाज गिल की गिरफ्तारी और हिरासत में उन्हें यातना देने की हुई घटना को इस बात का संकेत माना गया है कि पीटीआई पर लगाम लगाने के लिए मौजूदा सरकार किसी हद तक जाने को तैयार है।
राजनीतिक विश्लेषक जीशान अहमद ने अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून में लिखा है- ‘इमरान खान ने असंतुष्ट पाकिस्तानी नागरिकों को गोलबंद कर अपनी पार्टी को लोकप्रियता दिलाई। उनके समर्थकों में ज्यादातर मध्यवर्गीय नौजवान हैं। इमरान खान ने अपने इर्द-गिर्द पर्सनैलिटी कल्ट (व्यक्ति पूजा की संस्कृति) खड़ा कर लिया है। लेकिन उनके विरोधी मानते हैं कि राजनीति में उन्हें मिली सफलता के पीछे एस्टैब्लिशमेंट का हाथ है, जिसने उनका इस्तेमाल परंपरागत नेताओं पर नकेल कसने के लिए किया। अब एस्टैब्लिशमेंट ने उन्हें झटक कर अलग दिया है।’
ये आम समझ है कि एस्टैब्लिशमेंट के समर्थन के बिना पाकिस्तान की सियासत में कोई कामयाब नहीं हो सकता। इसलिए माना जा रहा है कि एस्टैब्लिशमेंट का साया हटने के कारण अब इमरान खान का बुरा वक्त शुरू हो सकता है।