जिस समय पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच बढ़ते टकराव की चर्चा ठोस रूप ले चुकी है, पाकिस्तान सरकार ने खुद को अफगानिस्तान के वकील के रूप में पेश करने की कोशिश की है। उसने अफगानिस्तान की रकम जब्त करने के अमेरिका के फैसले पर सवाल उठाया है। उसने कहा है कि ये रकम अफगानिस्तान की जनता की है, जिसका कैसे इस्तेमाल किया जाए, इसका फैसला वहां की सरकार ही कर सकती है। इस मुद्दे पर अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान भी भड़का हुआ है।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर बाड़ लगाने और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के मुद्दों पर हाल में अफगान तालिबान और पाकिस्तान के बीच खाई चौड़ी होती गई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छपी कुछ खबरों के मुताबिक पाकिस्तान से नाराज तालिबान ने हाल में भारत की मदद लेने के संकेत दिए हैं। एक फरवरी को संसद में पेश भारत के आम बजट में अफगानिस्तान के लिए सहायता रकम रखे जाने का तालिबान से जुड़े सूत्रों ने स्वागत किया था। इस बीच पाकिस्तान में जारी आतंकवादी हमलों के कारण भी पाकिस्तान और अफगान तालिबान में अविश्वास बढ़ा है। पाकिस्तान की सेना ने खुलेआम आरोप लगाया है कि तालिबान टीटीपी को पाकिस्तान के खिलाफ अपने देश की जमीन का इस्तेमाल करने दे रहा है।
रकम जब्त करेगा अमेरिका
अमेरिका के जो बाइडन प्रशासन ने शुक्रवार को अमेरिका में जमा अफगानिस्तान के 7.1 बिलियन डॉलर रकम के बारे में अपना आदेश जारी किया था। उसमें कहा गया कि 3.5 बिलियन डॉलर की रकम अमेरिका हमेशा के लिए जब्त कर रहा है, जिससे 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों के शिकार हुए लोगों के परिजनों को मुआवजा दिया जाएगा। बाकी आधी रकम अफगानिस्तान में मानवीय सहायता पर खर्च की जाएगी। लेकिन ये रकम कैसे खर्च होगी, इस बारे में निर्णय अमेरिकी अदालतें करेंगी।
इस बारे में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने शनिवार को एक बयान जारी किया। उसमें कहा गया कि अफगानिस्तान में मानवीय त्रासदी जैसे हालात बन रहे हैं, जिनका मुकाबला अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिल कर करना चाहिए। मंत्रालय ने कहा- इसके लिए जरूरी यह था कि अमेरिका में अफगानिस्तान के धन को निकालने पर लगाई गई रोक तुरंत हटा ली जाए। उस पैसे का कैसे इस्तेमाल हो, यह अफगान सरकार पर छोड़ दिया जाए। लेकिन अमेरिका ने इसके विपरीत निर्णय लिया है।
अमेरिका के इस फैसले की आलोचना
संयुक्त राष्ट्र स्थित पाकिस्तान के स्थायी दूत मुनीर अकरम ने भी एक अलग बयान में अमेरिका के इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा- ‘अफगान अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और उसे संचालित करने के लिए इस धन का निर्णायक महत्व है। लेकिन अगर कोई देश एकतरफा ढंग से किसी अन्य देश के धन को जब्त कर लेता है, तो उसका सीधा मतलब है कि उसकी वित्तीय प्रणाली में कुछ गड़बड़ी है।’ अफगानिस्तान के सेंट्रल बैंक ने 7.1 बिलियन डॉलर की रकम न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक में जमा कराई थी। लेकिन अगस्त 2021 में काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अमेरिका ने ये रकम जब्त कर ली।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि पाकिस्तान के इस बयान से अमेरिका से उसके रिश्तों में एक और पेंच पड़ सकता है। जबकि इससे वह अफगान तालिबान का दिल कितना जीत पाएगा, यह साफ नहीं है।