शरीफ ने कहा कि संविधान स्पष्ट रूप से विधायिका, न्यायपालिका और प्रशासन के बीच शक्तियों के विभाजन को परिभाषित करता है। यह एक ऐसी सीमा रेखा निर्धारित करता है, जिसे किसी को भी पार नहीं करना चाहिए।
आर्थिक और राजनैतिक संकट का सामना कर रहे पाकिस्तान में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश के मुख्य न्यायधीश की शक्तियों में कटौती करने की वकालत की है। मंगलवार को शहबाज शरीफ ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए इसके बारे में अपील की। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि अगर संसद ने देश के मुख्य न्यायाधीश की शक्तियों को कम करने के लिए कानून नहीं बनाया तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
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इस दौरान शरीफ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मंसूर अली शाह और न्यायमूर्ति जमाल खान मंडोखैल के कई असहमतिपूर्ण फैसले के बारे में विस्तार से बात की। इनमें मुख्य न्यायाधीश के स्वत: संज्ञान लेने के असीमित अधिकार, किसी भी मुद्दे पर कार्रवाई करना और विभिन्न मामलों की सुनवाई के लिए अपनी पसंद की पीठों का गठन करना, के लिए आलोचना की।
उनका तंज मुख्य न्यायाधीश उमर अता बंदियाल द्वारा 22 फरवरी को पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में चुनावों के बारे में स्वत: संज्ञान लेने के मामले के बारे में था। मुख्य न्यायाधीश की शक्ति को सीमित करने के लिए नए कानूनों की आवश्यकता के बारे में भावुक होकर बोलते हुए शरीफ ने कहा कि यदि कानून पारित नहीं किया गया तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
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गौरतलब है कि स्वप्रेरणा शक्ति पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 184 के तहत न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार पर आधारित है। हालाँकि, बीते कई सालों में इसके उपयोग ने मुख्य न्यायाधीशों की ओर से किए गए पक्षपात की छाप छोड़ी है। बावजूद इसके प्रधानमंत्री शरीफ के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार मुख्य न्यायाधीश की शक्तियों को कम करने के लिए संसद का उपयोग करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी यह भी कहा कि अदालतें पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के प्रमुख इमरान खान के साथ अनुकूल रवैया अख्तियार कर रही हैं। वे विभिन्न मामलों में इमरान को जवाबदेह ठहराने के लिए तैयार नहीं हैं।
शरीफ ने कहा कि संविधान स्पष्ट रूप से विधायिका, न्यायपालिका और प्रशासन के बीच शक्तियों के विभाजन को परिभाषित करता है। यह एक ऐसी सीमा रेखा निर्धारित करता है, जिसे किसी को भी पार नहीं करना चाहिए। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि संविधान द्वारा परिभाषित विधायिका की शक्तियों और न्यायपालिका की शक्तियों का उल्लंघन किया जा रहा है।