asif ali zardari and imran khan
- फोटो : Agency (File Photo)
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) में दरार पड़ने लगी है। पीडीएम के एक प्रमुख घटक दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने एलान कर दिया है कि वह अगला चुनाव गठबंधन के हिस्से के रूप में नहीं लड़ेगी।
पीपीपी के सह अध्यक्ष आसिफ अली जरदारी ने सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी अगला आम चुनाव पीडीएम के हिस्से के रूप में नहीं, बल्कि अपने चुनाव निशान तीर पर लड़ेगी। इसके पहले पार्टी के दूसरे सह-अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी कह चुके है कि अगर सिंध प्रांत में बाढ़ पीड़ितों की मदद में तेजी नहीं लाई गई, तो उनकी पार्टी शहबाज शरीफ सरकार से इस्तीफा दे देगी।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक पीडीएम की जारी अलोकप्रियता के कारण पीपीपी अब उससे दूरी बना रही है। पार्टी ने पिछले साल आई भीषण बाढ़ के पीड़ितों को ठीक राहत न पहुंचाने के मुद्दे के साथ-साथ महंगाई जैसे आर्थिक मसलों पर भी सरकार की आलोचना शुरू कर दी है।
इस बीच सियासी हलकों में पीपीपी के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के साथ हाथ मिलाने के कयास लगाए गए हैं। लेकिन आसिफ अली जरदारी ने इस संभावना का खंडन किया। उन्होंने कहा कि वे इमरान खान को राजनेता ही नहीं मानते।
उधर पीपीपी के वरिष्ठ नेता और सीनेटर रजा रब्बानी ने कहा है कि पीटीआई और पीडीएम की सरकार के बीच कोई फर्क नहीं है। दोनों की नीतियां वैसी हैं, जिनका पीपीपी पुरजोर विरोध करती है। इस बयान को भी पीडीएम के साथ दूरी बनाने की पीपीपी की कोशिश के रूप में देखा गया है।
विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने सिंध प्रांत के बाढ़ पीड़ितों से बीते हफ्ते मुलाकात की थी। उसी दौरान उन्होंने कहा था कि अगर बाढ़ पीड़ितों के किए गए वादों को नहीं निभाया गया, तो पीपीपी के मंत्री शहबाज शरीफ सरकार से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि संघीय सरकार ने बाढ़ पीड़ितों से जो वादे किए थे, उन्हें अभी तक पूरा नहीं किया गया है। बिलावल भुट्टो जरदारी ने कहा है कि उनकी पार्टी नेशनल असेंबली में प्रधानमंत्री के सामने सिंध प्रांत के मुद्दे उठाएगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि संघीय सरकार उन मसलों को हल करेगी।
रजा रब्बानी ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार संसद में सवालों का जवाब देने से बचने की कोशिश करती है। जबकि जरूरत इस बात की है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज मिलने में हो रही देरी और चीन के अलावा बाकी दोस्त देशों के मदद के लिए आगे न आने जैसे मसलों पर संसद को भरोसे में लिया जाए।
इन बयानों को पीपीपी की नई सियासी रणनीति का साफ संकेत समझा गया है। पीपीपी का मुख्य आधार सिंध प्रांत में है। वहां प्रांतीय सरकार भी इसी पार्टी की है। पर्यवेक्षकों के मुताबिक पीपीपी में यह राय बनी है कि अगर पीडीएम के हिस्से के रूप में वह चुनाव मैदान में उतरी, तो उसकी बुरी हार हो सकती है। इसलिए अब पार्टी नई सियासी राह पर चलने का संकेत दे रही है।