पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी को तोड़ कर उन्हें अलग-थलग करने की रणनीति में वहां की सेना को बड़ी सफलता मिली है। यह चर्चा पिछले नौ मई के बाद ही जोर पकड़ गई थी कि ‘एस्टैबलिशमेंट’ (सेना+खुफिया नेतृत्व) अब राजनीति में इमरान खान के लिए कोई जगह न छोड़ने पर आमादा हो गया है। नौ मई को खान को गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान सेना के ठिकानों और प्रतीक चिह्नों पर जगह-जगह हमले किए गए।
दस मई से इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कहर टूटा हुआ है। बड़े नेताओं सहित हजारों पार्टी समर्थकों को जेल में डाला गया है। इस बीच कुछ बड़े नेताओं को कोर्ट से जमानत मिलने के तुरंत बाद कानून की किसी न किसी दूसरी धारा के तहत गिरफ्तार किया गया। बताया जाता है कि बड़े नेताओं को हिरासत के दौरान यातना दी गई और उन्हें डराया-धमकाया गया। इसका असर कुछ दिन पहले दिखने लगा था, जब पीटीआई छोड़ने वाले नेताओं की संख्या बढ़ने लगी।
मंगलवार को पीटीआई को जबरदस्त झटके लगे, जब पार्टी के कई बड़े नेताओं ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। इमरान खान को ज्यादा झटका इस बात से लगा है कि कुछ रोज पहले तक उनके साथ अंत तक बने रहने का एलान करने वाले कुछ नेताओं ने मंगलवार को पार्टी छोड़ते वक्त पूर्व प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि इमरान खान पार्टी और उसके नेताओं को देश की जनता के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
जिन नेताओं ने पीटीआई छोड़ दी है, उनमें शिरीन मजारी, फयाजुल हसन चौहान, जमीन अहमद शरकपुरी, मकदूम इफ्तिखारुल हसन गिलानी, अब्दुल रज्जाक खान नियाजी, बिलाल अहमद गफ्फार और उमर उमरी शामिल हैं। इन सबने पार्टी छोड़ते वक्त सेना और सरकार की संस्थाओं तथा प्रतीकों पर हमलों की कड़ी निंदा की।
कुछ खबरों में बताया गया है कि एस्बैटबिशमेंट ने इमरान खान के सामने भी यह विकल्प रखा है कि वे नौ मई की हिंसा की निंदा करें और सुरक्षित विदेश चले जाएं। उनसे कहा गया है कि ऐसा ना करने पर उन्हें बाकी जिंदगी जेल में गुजारनी पड़ सकती है। इस सिलसिले में राष्ट्रपति आरिफ अल्वी की इस सार्वजनिक सलाह को अहम माना गया है कि इमरान खान को नौ मई की हिंसा की निंदा करते हुए उस रोज की घटनाओं पर अफसोस जताना चाहिए।
पीटीआई नेताओं ने मीडियाकर्मियों से बातचीत में अपना नाम ना छापने की शर्त पर बताया है कि उन्हें ‘ताकतवर हलकों’ से ऐसे संदेश मिल रहे हैं कि वे पीटीआई तुरंत छोड़ दें। विशेषज्ञों का कहना है कि जो हालात बन गए हैं, उनमें सबसे बड़ी भूमिका अदालतों की बन गई है। अगर उनसे इमरान खान और पीटीआई को संरक्षण नहीं मिला, तो पीटीआई के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा।
इस बीच यह सुझाव भी दिया गया है कि इमरान खान को सरकार और सेना से बातचीत के लिए पहल करनी चाहिए। हालांकि इमरान खान के निकट सूत्रों का कहना है कि इमरान खान ऐसी पहल नहीं करेंगे और अंतिम दम तक अपने रुख पर कायम रहने के इरादे पर अडिग हैं।