पाकिस्तान में आतंकवादियों के बढ़ते हौसलों का असर यह है कि अब दहशतगर्द निर्वाचित प्रतिनिधियों से भी ‘चंदा’ उगाहने लगे हैं। शुक्रवार को कुछ समय पहले हुई एक ऐसी घटना सामने आई। इसके मुताबिक पाकिस्तान उत्तर-पूर्वी इलाके में एक प्रांतीय विधायक एक दिन जब अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के साथ चाय पी रहे थे, तभी उनके फोन पर आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का मेसेज आया। इस मेसेज में ‘चंदे’ की मांग करते हुए लिखा था- ‘आशा है आप नाउम्मीद नहीं करेंगे। वित्तीय सहायता देने से आपने इनकार किया, तो हम आपके लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। आप समझदार आदमी हैं, इसलिए समझ गए होंगे कि हम क्या कहना चाहते हैं।’
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पिछले साल अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद से देश के उत्तर-पूर्वी इलाकों में टीटीपी की दूर-दराज तक पैठ बन गई है। उनका आतंक ऐसा है कि वहां के उपरोक्त प्रांतीय विधायक ने पिछले जुलाई के बाद से टीटीपी को 12 लाख रुपये दिए हैं। उस विधायक ने शुक्रवार को पाकिस्तान की एक न्यूज एजेंसी को बताया- ‘जो लोग उन्हें पैसा नहीं देते हैं, उन्हें इसके नतीजे भुगतने पड़ते हैं। कभी वे ऐसे लोगों के दरवाजे पर बम फेंक देते हैं, तो कभी-कभी गोली भी मार देते हैं। वहां हर शख्स अपनी जिंदगी को लेकर डरा हुआ है।’
टीटीपी हालांकि अलग संगठन है, लेकिन अफगान तालिबान से इसका निकट रिश्ता रहा है। 2007 से 2009 के बीच उसने पाकिस्तान बड़े पैमाने पर दहशतगर्दी मचाई थी। तब पाकिस्तान सेना उसके खिलाफ युद्ध छेड़ा। 2014 तक इस गुट का लगभग खात्मा कर दिया गया था। लेकिन पिछले साल से इसने फिर सिर उठा लिया है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगान तालिबान ने टीटीपी को खुला संरक्षण दे रखा है।
इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्युरिटी स्टडीज से जुड़े विश्लेषक इम्तियाज गुल ने अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यन से कहा- ‘अफगानिस्तान की सत्ता फिर से तालिबान के हाथ में आने के बाद टीपीपी को वहां खुली पनाह मिली हुई है। अफगानिस्तान में रहते हुए उन्हें हमले करने की आजादी मिली हुई है। इसीलिए अब टीटीपी के हमले बढ़ गए हैं।’
स्वात इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता अहम शाह ने कहा- ‘टीटीपी ने पुराना खेल शुरू कर दिय है। हत्या, बम विस्फोट, अपहरण, लूट-खसोट के लिए फोन करना आदि वहां आम बात बन गई है। उनकी गतिविधियों के कारण स्थानीय सरकार में लोगों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है।’ इसके पहले इस इलाके से चुने गए सांसद निसार अहमद ने अनुमान लगाया था कि उस क्षेत्र के समृद्ध लोगों में से 80 से 95 फीसदी टीटीपी के ब्लैकमेल का शिकार बने हैं।
जानकारों के मुताबिक धमकी या ‘चंदा वसूली’ के लिए आने वाले फोन अक्सर अफगानिस्तान के नंबरों से आते हैं और उस तरफ से बातचीत पश्तो भाषा में की जाती है। यह इस बात का संकेत है कि टीटीपी अपनी गतिविधियां अफगानिस्तान में मौजूद अड्डों से चला रहा है। ये मुद्दा कई बार पाकिस्तान सरकार तालिबान के सामने उठा चुकी है, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला है।