पाकिस्तान के दो प्रांतों में चुनाव टालने की कोशिश को लेकर देश में राजनीतिक उथल-पुथल बढ़ती जा रही है। चुनाव टालने की निर्वाचन आयोग की घोषणा के बाद से देश में कई जगहों पर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थकों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक पंजाब और खैबर पख्तूनवा प्रांतों की असेंबलियों का चुनाव 30 अप्रैल को होने वाला था। लेकिन इस बुधवार को निर्वाचन आयोग ने इसे अगले आठ अक्तूबर तक स्थगित करने की घोषणा की।
निर्वाचन आयोग ने चुनाव कराने के लिए जरूरी धन की कमी और सुरक्षा बलों की पर्याप्त उपलब्धता ना होने का तर्क देते हुए चुनाव टालने का एलान किया। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने इस निर्णय के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया है। इमरान खान ने इस फैसले को संविधान का खुल्ला उल्लंघन और कानून के राज की हत्या बताया है। पीटीआई इस मामले को फिर सुप्रीम कोर्ट ले गई है।
इमरान खान देश में जल्द आम चुनाव कराने के लिए आंदोलन चला रहे हैं। इसी के लिए दबाव बनाने के मकसद से उनकी पार्टी ने दोनों प्रांतों में असेंबलियों को भंग कराया था। पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक किसी सदन के भंग होने के बाद 90 दिन के अंदर उसका चुनाव कराना अनिवार्य है। लेकिन प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार चुनाव से बचने की कोशिश में रही है। आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने सरकार के दबाव में चुनाव टालने का फैसला लिया है।
पर्यवेक्षकों ने अंदेशा जताया है कि ताजा घटनाक्रम के बाद देश में बढ़े सियासी टकराव का असर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज पाने की पाकिस्तान की कोशिश पर पड़ सकता है। आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए 6.5 बिलियन डॉलर का कर्ज मंजूर किया है, लेकिन कहा है कि उसकी शर्तों पर अमल के बाद ही इस रकम का भुगतान किया जाएगा। वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक आईएमएफ ने एक शर्त यह भी लगाई है कि पीटीआई आईएमएफ की शर्तों पर अमल के बारे में लिखित वादा करे। आईएमएफ को अंदेशा है कि अगर अगले चुनाव के बाद पीटीआई सत्ता में आई, तो वह उन ‘सुधार कार्यक्रमों’ से पीछे हट सकती है, जिन्हें स्वीकार करने के लिए शहबाज शरीफ सरकार तैयार हुई है।
इस्लामाबाद स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज में रिसर्च फेलॉ अहमद नईम सालिक के मुताबिक पीटीआई के लिए ऐसे आश्वासन पत्र पर दस्तखत करना बेहद मुश्किल है। उन्होंने कहा- पीटीआई सत्ता में लौटी, तो उसके लिए उस रास्ते पर ही चलना आसान नहीं होगा, जिनकी वजह से शहबाज शरीफ सरकार और मौजूदा सत्ताधारी गठबंधन- पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) देश में बेहद अलोकप्रिय हुए हैं।
पॉलिसी रिसर्च फर्म इकेरस के सीनियर प्रोग्राम मैनेजर अहसान हामिद दुर्रानी ने भी यही राय जताई है कि पीटीआई से ऐसा वादा हासिल करना आसान नहीं होगा। लेकिन उन्होंने कहा- ‘इमरान खान आईएमएफ की इस शर्त को सरकार से चुनाव के समय पर सौदेबाजी का मौका बना सकते हैं।’ उन्होंने कहा कि आईएमएफ और पाकिस्तान के बीच विश्वास का संकट खड़ा हो गया है। आईएमएफ के मन में यह शक पैदा हो गया है कि ऋण मिलने के बाद संभव है कि पाकिस्तान उसकी शर्तों पर पूरा अमल ना करे।