जैसे ही सीनेट चुनाव करीब आते हैं मंडी खुल जाती है, बोली लगनी शुरू हो जाती है, ताकत कम है तो दूसरी पार्टी के सदस्यों को खरीदने की कोशिश होती है। एस्टेबलिशमेंट किसी खास गुट को ऊंचा या नीचा दिखाना चाहती हो तो भी प्रदेश विधानसभाओं के सदस्यों को कठपुतली की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश से नहीं चूकती।
और फिर ऐसे ऐसे चमत्कार होते हैं जैसे बलूचिस्तान में कहने को नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग (एन) सबसे बड़ी पार्टी है मगर सीनेट इलेक्शन से पहले उसमें बगावत हो गई और सारे सीनेट सदस्य बागियों के धड़े से चुन लिए गए।
खैबर पख्तूनख्वा में पीपुल्ज पार्टी की छह सीटें है मगर उसने इमरान खान की पार्टी के बीस से अधिक सदस्यों को नोट दिखाकर अपने हित में वोट डलवा लिए और दो सीनेट सीटें ले उड़ी। इमरान खान मुंह देखते रह गए।
इमरान खान की पार्टी के ही एक सदस्य ने पंजाब विधानसभा में नवाज शरीफ की पार्टी के चौदह सदस्यों से वोट पकड़ लिए, हालांकि नवाज शरीफ और इमरान खान कट्टर विरोधी हैं। सिंध प्रांत में भी यही हुआ और जिसका जोर और पैसा चला, उसने सीटें उचक लीं। अब जो इस रास्ते से सीनेट में आएगा वो पहले अपना मालपानी खर्चा पूरा करेगा या देश या अपने प्रांत की बेहतरी के बारे में सोचेगा।
ये लोकतंत्र है कि मायातंत्र। हर बार चैं पैं चैं पैं होती है और फिर जीवन अपने टेढ़े ढर्रे पर उस वक्त तक चलता रहता है जब तक अगली चुनाव मंडी नहीं लग जाती।