पाकिस्तान सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आगे फिर हाथ फैलाने की सूरत आने वाली है। इसकी वजह ये अनुमान है कि वित्त वर्ष 2022-23 के बजट में पाकिस्तान सरकार को 30 अरब डॉलर तक के खर्च का प्रावधान करना होगा। इतना पैसा सरकार के पास नहीं है। आईएमएफ से अभी जो कर्ज मंजूर हुआ है, उसकी अवधि सितंबर 2022 में पूरी हो जाएगी।
उधर, आलोचकों का कहना है कि अगर पाकिस्तान फिर से आईएमएफ से कर्ज मांगने जाता है, तो यह नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का उल्लंघन होगा। इसी महीने पाकिस्तान सरकार ने इस नीति को मंजूरी दी है। इस नीति में यह सिफारिश की गई है कि पाकिस्तान सरकार को आईएमएफ और दूसरी बहुपक्षीय एजेंसियों से कर्ज लेने से बचना चाहिए।
मगर पाकिस्तान सरकार के पास फिलहाल इस सिफारिश पर अमल करने की कोई योजना नहीं है। जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान आईएमएफ से और कर्ज लेने से तभी बच सकता है कि अगर संघीय और प्रांतीय सरकारें अगले 18 महीनों में भुगतान के लिए जरूरी 45 से 50 बिलियन डॉलर की रकम जुटाने के वैकल्पिक विदेशी स्रोत ढूंढने में सफल हों। ये मुमकिन नहीं दिखता है।
द न्यूज के मुताबिक पकिस्तान में वित्तीय प्रबंधन से लंबे समय से जुड़े रहे एक अधिकारी ने उससे कहा कि मौजूदा हालत में देश को आर्थिक विकास की बात कुछ वर्षों के लिए भूल जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी सबसे बड़ी चुनौती भुगतन संतुलन को संभालना है। अगर इसमें देश नाकाम रहा, तो वह बहुत बड़े संकट में फंस जाएगा और देश का विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो जाएगा।
पाकिस्तान सरकार की इकोनॉमिक रिफॉर्म यूनिट के महानिदेशक खकन नजीब ने भी यह स्वीकार किया है कि पाकिस्तान की भुगतान संतुलन की स्थिति कमजोर है। उन्होंने कहा कि इसकी वजह महंगे आयात का बढ़ना है, जिससे देश का व्यापार घाटा बढ़ गया है। उसी का परिणाम है कि पाकिस्तान के चालू खाते का घाटा संभाल सकने की सीमा से ऊपर जाता दिख रहा है।
इस बीच कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में चढ़ रहे भाव ने पाकिस्तान की चिंताएं और बढ़ा दी हैं। ये महंगाई जारी रही, तो पाकिस्तान को और अधिक विदेशी मुद्रा पेट्रोलियम की खरीदारी पर खर्च करनी होगी।