पाकिस्तान में सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में सरकारी कर्ज का अनुपात हाल में तेजी से बढ़ा है। इसे देश के लिए खतरे का संकेत समझा जा रहा है। विशेषज्ञों ने कहा है कि अमेरिका ब्याज दर बढ़ने के कारण डॉलर में लिए गए कर्ज का बोझ तमाम देशों पर बढ़ रहा है। इस कारण इन देशों को कर्ज चुकाने के लिए अपने पास मौजूद पूंजी का अतिरिक्त हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस नए बोझ को सह पाने की स्थिति में नहीं है।
पाकिस्तान में एक और चिंता यह है कि आर्थिक संकट ने उस समय गंभीर रूप ले लिया है, जब देश राजनीतिक अस्थिरता का भी सामना कर रहा है। कुछ विश्लेषकों की राय है कि पाकिस्तान के वर्तमान आर्थिक संकट का काफी दोष पूर्व इमरान खान सरकार पर है, लेकिन अब खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) अब बढ़ती मुसीबतों को सियासी मुद्दा कर वर्तमान शहबाज शरीफ सरकार को घेर रही है।
अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट में पाकिस्तान संबंधी यूनिट के सह-संस्थापक आसिम एजाज ख्वाजा ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से बातचीत में कहा- ‘वर्तमान आर्थिक स्थिति के लिए मौजूदा सरकार को दोषी ठहरा देना आसान रास्ता है। लेकिन हकीकत यह है कि ये संकट दशकों से अपनाई गई नीतियों और लिए गए फैसलों का नतीजा है। समस्या इसलिए खड़ी हुई है कि देश में दीर्घकालिक योजना कभी नहीं बनाई गई और कभी उत्पादकता पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया।’
पाकिस्तान में ब्याज दरें भी बढ़ाई जा रही हैं। मई में स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (सेंट्रल बैंक) ने मुद्रास्फीति पर काबू पाने की कोशिश में ब्याज दरों में 150 आधार अंकों की बढ़ोतरी की थी। अब देश में ब्याज दर 13.75 फीसदी हो गई हैं। ब्याज दर बढ़ने से कर्जदार कंपनियों की मुश्किलें बढ़ीं हैं। लेकिन महंगाई भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जिसकी दर पिछले महीने 13.8 फीसदी तक पहुंच गई।
इन हालात को देखते हुए तमाम विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट में है, जिससे निकट भविष्य में इसके निकल पाने की संभावना नजर नहीं आ रही है। क्या इस संकट के कारण देश में श्रीलंका जैसी हालत पैदा होगी, ये सवाल लगातार चर्चा में बना हुआ है।