अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने पाकिस्तान को अग्नि-परीक्षा में खड़ा कर रखा है। मंजूर हो चुके कर्ज को जारी करने से पहले पाकिस्तान और आईएमएफ के बीच तकनीकी वार्ता का पहला दौर शुक्रवार को पूरा हो गया। इसका कुल हासिल यह रहा कि आईएमएफ ने पाकिस्तान की आर्थिक और वित्तीय स्थिति के बारे में नौ सारणियां (tables) उसे देने का फैसला किया, जिसके आधार पर अगले हफ्ते फिर से नीतिगत वार्ता होगी। विश्लेषकों के मुताबिक इस हफ्ते चली वार्ता से यह साफ संकेत मिला है कि पाकिस्तान को आईएमएफ से तुरंत राहत मिलने की संभावना नहीं है।
जानकारों के मुताबिक अगले हफ्ते आईएमएफ सुधार के जो नुस्खे पाकिस्तान के सामने रखेगा, अगर उस पर सहमति बनी, तो फिर दोनों पक्षों के बीच कर्मचारी स्तर (स्टाफ लेवल) का समझौता होगा। इस बीच पाकिस्तान के अधिकारियों ने अर्थव्यवस्था के बारे में जो अनुमान आईएमएफ के सामने पेश किए हैं, उनसे देश में चिंता और बढ़ी है। इनके मुताबिक इस वित्त वर्ष में जीडीपी की अनुमानित वृद्धि को पांच फीसदी से घटा कर लगभग 1.5 फीसदी कर दिया गया है। इसके अलावा महंगाई दर में वृद्धि के अनुमान को 12.5 फीसदी से बढ़ा कर 29 फीसदी कर दिया गया है।
जब यह अनुमान आईएमएफ की टीम के सामने पेश किया गया, तो आईएमएफ के अधिकारियों ने साफ कहा कि इस हालत में पाकिस्तान सरकार के जीडीपी-टैक्स अनुपात की स्थिति और बदतर होगी। जबकि आईएमएफ की शर्त है कि पाकिस्तान में जीडीपी की तुलना में टैक्स का अनुपात बढ़ाया जाना चाहिए। समझा जाता है कि आईएमएफ की टीम जो नौ सारणियां पेश करेगी, उसमें नई स्थितियों में टैक्स अनुपात बढ़ाने संबंधी सुझाव भी होंगे।
जिस समय देश में महंगाई आसमान पर है, शहबाज शरीफ सरकार के लिए टैक्स और बढ़ाना एक बेहद मुश्किल फैसला होगा। वार्ता में शामिल एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार द न्यूज को बताया- ‘आईएमएफ ने कर लगाने और दूसरे उपायों से राजस्व जुटाने के बारे में कठिन सुझाव सामने रखे हैं। आईएमएफ चाहता है कि बढ़ रहे राजकोषीय घाटे पर किसी भी रूप में काबू पाया जाए।’
पर्यवेक्षकों के मुताबिक वित्त मंत्री इशहाक डार परोक्ष करों को बढ़ाने के खिलाफ रहे हैं। साथ ही वे आईएमएफ को इस बात पर राजी करने की कोशिश में हैं कि पेट्रोलियम पर लगाए गए लेवी को हटाने की इजाजत वह दे दे। सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दल चुनाव के इस साल में कठिन फैसले लेने के लिए तैयार नजर नहीं आ रहे हैं। गठबंधन के भीतर यह आशंका जताई गई है कि पहले से ही मुसीबत झेल रहे लोगों पर और आर्थिक मार डालना गठबंधन में शामिल दलों के लिए आत्मघाती कदम होगा।
इस बीच पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के अध्यक्ष इमरान खान ने देश के सामने मौजूद चुनौतियों पर राजनीतिक आम सहमति तैयार करने की प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मंशा पर पानी फेर दिया है। उन्होंने सात फरवरी को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वे ‘आयातित फासीवादी’ सरकार के साथ कोई सहयोग नहीं कर सकते।