तीस वर्षीय जुनैद हफीज पाकिस्तान के मुल्तान शहर की बहाउद्दीन जकारिया यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम कर रहे थे। उन्हें 13 मार्च 2013 को गिरफ्तार किया गया था और उन पर कथित रूप से छात्रों को पढ़ाने के दौरान और फेसबुक अकाउंट पर ईशनिंदा का आरोप लगे थे।
पिछले साल पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा के एक मामले में बरी कर दिया था जबकि निचली अदालतों ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आसिया बीबी के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निचली अदालतों के लिए एक मिसाल कायम होनी चाहिए थी कि ईशनिंदा के हर उस मामले को खारिज कर दिया जाएगा जो पक्के तौर पर साबित नहीं हुआ। इस फैसले के मद्देनजर, जुनैद हफीज को दोषी करार दिया जाना न्याय का उपहास है, और हम उन पर थोपे गए मृत्युदंड की निंदा करते हैं। हम पाकिस्तान में ऊपरी अदालतों से आग्रह करते हैं कि जल्द से जल्द उनकी अपील को सुना जाए, मौत की सजा के फैसले को पलटा जाए और उन्हें बरी किया जाए।
सबूतों पर उठे सवाल
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत असाधारण हालात में ही किसी को मौत की सजा सुनाई जा सकती है और इरादतन हत्या के लिए अकाट्य साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
यूएन विशेषज्ञों का कहना है कि जुनैद हफीज पर जो मृत्युदंड थोपा गया है उसका कोई कानूनी आधार नहीं है और इसलिए यह अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि इस सजा पर अमल होना मनमाने ढंग से किसी को मारने जैसा होगा।
स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई कि ईशनिंदा के आरोप अब भी लोगों पर लगाए जा रहे हैं जो जायज तौर पर सोच, विवेक, धर्म और अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर रहे हैं।
जुनैद हफीज को वर्ष 2014 में मुकदमे की कार्रवाई शुरू होने के बाद से एकांतवास में रखा गया है जिससे उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है। उन्हें मौत की सजा जिला और सत्र न्यायालय में 21 दिसंबर 2019 को सुनाई गई।
विशेषज्ञ बताते हैं कि लंबे समय तक एकांतवास में रखा जाना यातना और अन्य अन्य अमानवीय व अपमानजनक व्यवहार व सजा देना जैसा हो सकता है।
स्वतंत्र विशेषज्ञों ने बताया कि इस मामले में मुल्तान की अदालत में लंबा मुकदमा चला लेकिन अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पुख्ता सबूत नहीं दे पाया।
इसके अलावा अदालत में कुछ दस्तावेज ऐसे पेश किए गए जिनकी स्वतंत्र रूप से फॉरेंसिक समीक्षा नहीं हुई जबकि उन पर जाली होने के आरोप लगे थे और हफीज के वकील राशिद रहमान की 2014 में हत्या कर दी गई और हत्यारों को सजा नहीं दी गई।
यूएन विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले की सुनवाई कर रही न्यायिक टीम के सदस्यों में डर का माहौल है। यह इसलिए भी समझा जा सकता है क्योंकि लंबे मुकदमे की कार्रवाई के दौरान कम से कम सात जजों का ट्रांसफर किया गया।