शायद यह पहला मौका है, जब पाकिस्तान में सेना के बजट पर सवाल उठाए गए हैं। देश की खराब आर्थिक हालत के बीच बढ़ाए गए रक्षा बजट को लेकर देश के कई हलकों में चिंता जताई गई है। शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) सरकार ने पिछले हफ्ते वित्त वर्ष 2022-23 का बजट पेश किया था। उसमें जहां बुनियादी विकास से जुड़े क्षेत्रों के लिए बजट में भारी कटौती की गई, वहीं रक्षा के लिए धन में बढ़ोतरी की गई। इससे विवाद खड़ा हो गया।
बाबर ने कहा कि अगर मुद्रास्फीति की दर और पाकिस्तानी रुपये के मूल्य में गिरावट को ध्यान में रखें, तो असल में रक्षा बजट में गिरावट आई है। उन्होंने दावा किया कि पिछले साल पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद का 2.8 फीसदी हिस्सा रक्षा के लिए रखा गया था, जबकि इस वर्ष ये हिस्सा सिर्फ 2.2 फीसदी है।
बीते शुक्रवार को पेश बजट में वित्त मंत्री मिफ्ताह इस्माइल ने रक्षा के लिए 1,523 अरब रुपये आवंटित किए थे। यह अगले वित्त वर्ष में होने वाले कुल सरकारी खर्च का 17.5 फीसदी है। इसके अलावा यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 11.16 फीसदी ज्यादा है। ये रकम सरकार के कुल नियोजित मद का 16 फीसदी है। पिछले साल भी सरकार ने नियोजित मद का इतना ही हिस्सा रक्षा खर्च के लिए रखा था।
सेना की तरफ से स्पष्टीकरण आने के बाद आलोचकों ने सेना के इस आकलन से असहमति जताई है कि रक्षा बजट में असल में गिरावट आई है। ऐसी राय रखने वाले विशेषज्ञों का दावा है कि बीते एक साल में जितनी औसत मुद्रास्फीति रही, रक्षा खर्च में उसके बराबर बढ़ोतरी कर दी गई है। हालांकि पाकिस्तानी मीडिया में छपी कई टिप्पणियों में सेना के इस दावे से सहमति जताई गई है कि रक्षा खर्च की तुलना दूसरे क्षेत्रों से नहीं की जानी चाहिए।
मेजर जनरल बाबर ने कहा कि सेना के लिए धन का आवंटन ‘खतरे के अनुमान, चुनौतियों, विकास और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए’ किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि सेना ने फिजूलखर्ची कम करने के ठोस उपाय किए हैँ। इसके तहत ईंधन की बचत और कई सुविधाओं का उपयोग घटाया जा रहा है।
इस बीच इसे एक अहम घटना समझा गया है कि सेना को अपने बजट को लेकर अब सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना पड़ा है। इसे पाकिस्तान में जनमत की बदलती धारणा का संकेत माना गया है।