Pakistan Army Chief Lieutenant General Asim Munir meets with President of Pakistan Arif Alvi
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पाकिस्तान के नए सेनाध्यक्ष जनरल असीम मुनीर देश के आंतरिक और बाहरी मामलों में अपनी क्या भूमिका बनाएंगे, इस समय यहां सबसे चर्चित सवाल यही है। रिटायर्ड हुए सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा के बाद पाकिस्तानी सेना में जनरल मुनीर से सीनियर कोई और अधिकारी नहीं था। जनरल मुनीर को पाकिस्तान के आतंकवाद ग्रस्त उत्तर-पूर्वी इलाके और भारतीय सीमा के पास सैन्य गतिविधियों का कमांडर रहने का अनुभव है। इसके अलावा वे कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख भी रह चुके हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति पर सेना के अंदर कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ है।
लेकिन राजनीतिक हलकों में उनकी नियुक्ति उतनी निर्विवाद नहीं रही है। मुनीर को आईएसआई प्रमुख के पद से तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने बर्खास्त कर दिया था। तब खान की सकरार ने मुनीर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इसीलिए शुरुआती रिपोर्टों में मुनीर की नियुक्ति को अब सत्ता में लौटने की जद्दोजहद में जुटे इमरान खान के लिए एक तगड़ा झटका माना गया। लेकिन अब सामने आया है कि उनकी नियुक्ति को मंजूरी देने से पहले राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने लाहौर जाकर इस बारे में इमरान खान से राय-मशविरा किया था। अल्वी का संबंध इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) से रहा है।
जिन खबरों में अल्वी के इमरान से राय-मशविरा करने की बात कही गई है, उनमें यह नहीं बताया गया है कि इस बारे में पीटीआई अध्यक्ष की क्या प्रतिक्रिया रही। लेकिन उनके समर्थकों में अभी भी यही भावना है कि शहबाज शरीफ सरकार ने मुनीर की नियुक्ति इमरान खान को घेरने की अपनी रणनीति के तहत की है। इसलिए सियासी चर्चाओं में उनकी नियुक्ति विवादास्पद बनी हुई है।
सामरिक विशेषज्ञों को आशंका है कि अगर अगले साल के चुनाव में इमरान खान की सत्ता में वापसी हो गई, तब सरकार और सेना के बीच ऐसा टकराव खड़ा हो सकता है, जैसा इसके पहले कभी पाकिस्तान के इतिहास में नहीं हुआ है। अभी तक के तमाम संकेत यही हैं कि जब कभी चुनाव होंगे, पीटीआई को बड़ी जीत मिलेगी।
रक्षा विश्लेषक टिम विलसे ने एक रक्षा वेबसाइट पर लिखे अपने विश्लेषण में कहा है कि जनरल मुनीर के लिए एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री से निपटना आसान नहीं होगा। अतीत में सेनाध्यक्ष अपने लिए असहज प्रधानमंत्रियों का तख्ता पलट देने का रास्ता अपनाते रहे हैं। लेकिन इमरान खान की देश में जैसी लोकप्रियता है, उसे देखते हुए ऐसा दुस्साहस सेना के साथ पूरे देश को भारी पड़ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि इमरान खान का जनरल बाजवा से टकराव इसी कारण हुआ कि वे स्वतंत्र रूप से फैसले लेते थे। पाकिस्तानी सेना के लिए इसे बर्दाश्त करना आसान नहीं होता। लेकिन संभव है कि अगर इमरान सत्ता में लौटे, तो जनरल मुनीर को ऐसी कड़वी घूंटे पीनी पड़ सकती हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक जनरल मुनीर के सामने कई बड़ी चुनौतियां विदेशी मोर्चों पर भी हैं। इनमें सबसे पहली चुनौती अमेरिका और चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाने की है। उनके सामने दूसरी बड़ी चुनौती अफगानिस्तान के मोर्चे पर है। अगस्त 2021 में काबुल की सत्ता पर तालिबान के कब्जे के बाद पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों बेहतर होने की उम्मीदें पर टूट चुकी हैं। आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) अफगानिस्तान में मौजूद अपने अड्डों से लगातार पाकिस्तान पर हमले कर रहा है। जनरल बाजवा के समय पाकिस्तानी सेना टीटीपी और अफगान तालिबान का मुकाबला करने में कई बार लड़खड़ाती नजर आई थी। समझा जाता है कि अब इन मोर्चों पर जनरल मुनीर की अग्नि-परीक्षा होगी।