तत्कालीन सीजेपी उमर अता बंदियाल की अध्यक्षता वाली आठ सदस्यीय पीठ ने इस साल अप्रैल में निवर्तमान संसद द्वारा पारित कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी और इसे 'शीर्ष न्यायपालिका की आजादी' के खिलाफ बताया था। 'उच्चतम न्यायालय अभ्यास और प्रक्रिया विधेयक 2023' कानून का सबसे उल्लेखनीय प्रावधान मुख्य न्यायाधीश के संज्ञान लेने के अधिकार को हटाना है।
कानून के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय पीठ पीठों के गठन और संज्ञान लेने या न लेने के बारे में फैसला करेगी। यह पहले मुख्य न्यायाधीश का एकमात्र विशेषाधिकार था। कानून के मुताबिक शीर्ष अदालत के समक्ष हर कारण, मामले या अपील की सुनवाई और निपटान मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से बनी एक समिति द्वारा गठित पीठ द्वारा की जाएगी। इसमें कहा गया है कि समिति के फैसले बहुमत से लिए जाएंगे। कानून में संज्ञान मामलों में फैसले के तीस दिनों के भीतर अपील दायर करने का अधिकार भी शामिल था।
इसमें यह भी कहा गया है कि संवैधानिक व्याख्या से जुड़े किसी भी मामले में पांच से कम न्यायाधीशों की पीठ नहीं होगी। हालांकि, पीठ ने मामूली बहुमत के साथ घोषणा की कि नया कानून पिछले फैसलों पर लागू नहीं होगा। इसका मतलब है कि यह विधेयक तीन बार प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ, पूर्व प्रधानमंत्री सैयद यूसुफ रजा गिलानी और कई अन्य सांसदों को अयोग्य ठहराए जाने के खिलाफ अपील करने की अनुमति नहीं देगा।