पश्चिमी अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में मार्च महीने में सरकारी बलों द्वारा 100 से अधिक नागरिकों की हत्या किए जाने का आरोप लगाया गया है। यह जानकारी मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह नरसंहार सोलेंजो कस्बे के पास हुआ और इसमें शामिल हमलावर बुर्किना फासो की विशेष सैन्य बल और सरकार समर्थक "वॉलंटियर्स फॉर द डिफेंस ऑफ द होमलैंड (VDP)" नामक मिलिशिया ग्रुप के सदस्य थे। मारे गए सभी लोग फुलानी समुदाय से थे, जो एक पशुपालक जातीय समूह है। इस समुदाय को सरकार लंबे समय से इस्लामी चरमपंथियों का समर्थक मानती आई है।
हत्याकांड में सरकारी बलों की भूमिका का दावा
पहले भी HRW ने सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर यह संकेत दिया था कि इस हत्याकांड में सरकारी बलों की भूमिका हो सकती है, लेकिन अब तक कोई निश्चित प्रमाण नहीं था। हालांकि, सरकार ने उस समय आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि "ऐसी झूठी सूचनाएं देश की सामाजिक एकता को कमजोर करने की कोशिश हैं।"
HRW की सीनियर शोधकर्ता इलारिया एलेग्रोजी ने कहा, “सोलेंजो में हुए अत्याचारों के वीडियो ने पूरे सहेल क्षेत्र को झकझोर दिया, लेकिन वो केवल कहानी का एक हिस्सा हैं। आगे की जांच में सामने आया कि इस नरसंहार के पीछे बुर्किना फासो की सेना का हाथ है।”
प्रतिक्रिया में इस्लामी आतंकियों ने की जवाबी हत्याएं
रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बलों के जाने के बाद JNIM (जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन) नामक एक जिहादी संगठन ने इलाके में प्रवेश कर उन लोगों को निशाना बनाया जिन्हें उन्होंने सैन्य सहयोगी माना। एक प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, सभी पुरुषों को गांव के हेल्थ सेंटर के सामने लाइन में खड़ा कर गोली मार दी गई। इसमें करीब 70 लोगों की जान चली गई।
फुलानी या तो मारे गए या भाग गए
रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में फुलानी निवासी माली की ओर भाग गए। सोलेंजो के स्थानीय नागरिक ने बताया कि पूरी प्रांत में कोई भी फुलानी नहीं बचा है। उन्हें या तो मार दिया गया या वे भाग गए या कैद कर लिए गए। लेकिन अन्य जातीय समुदाय वहीं बने हुए हैं।
सवालों के घेरे में सेना की रणनीति
विश्लेषकों के अनुसार, 2022 में सत्ता में आई सैन्य सरकार द्वारा अनुशासनहीन नागरिक मिलिशिया की भारी भर्ती और सैन्य शक्ति के अत्यधिक प्रयोग ने जातीय तनाव को और बढ़ा दिया है। देश के 60% से अधिक हिस्से पर अब सरकार का नियंत्रण नहीं है और करीब 21 लाख लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। मानवाधिकार संगठनों ने यह भी आरोप लगाया कि देश में सेंसरशिप का माहौल है और जो लोग बोलने की हिम्मत करते हैं, उन्हें गिरफ्तार, अगवा या जबरन सेना में भर्ती किया जा सकता है।