अमेरिका चीन के साथ-साथ ताइवान से भी संबंध रखता है। कहा जाता है कि ताइवान से उसके अनाधिकारिक संबंध काफी मजबूत हैं और अमेरिका ताइवान की संप्रभुता का पक्षकार है। चीन अमेरिका से नीति और निर्माण को कूटनीति से ज्यादा अहम मानता है। ताइवान से रिश्ता तोड़ने वाले देशों में अफ्रीका और कैरिबियाई गरीब देश शामिल है। यह देश समय-समय पर संबंध बना और तोड़ चुके हैं।
दुनिया के ज्यादातर देश और संयुक्त राष्ट्र ताइवान को स्वतंत्र देश नहीं मानते, लेकिन इसके बावजूद वो पूरी तरह से अलग नहीं हैं। 22 देशों को छोड़कर बाकी देश ताइवान को अलग नहीं मानते। ओलंपिक जैसे वैश्विक आयोजनों में ताइवान चीन के नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकता लिहाजा वह लंबे समय से चाइनीज ताइपे के नाम से उतरता है।
मोदी सरकार बनाने के बाद भारत और ताइवान के द्विपक्षीय संबंध मजूबत बनाने के लिए कई समझौते हो चुके हैं। भारत के रूख में आये इस परिवर्तन की ताइवान की मीडिया में काफी सराहना की गई थी। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभालते ही लुक ईस्ट का नारा दिया था। विशेषज्ञों की मानें तो ताइवान के साथ भारत के बढ़ते संबंध इसी नीति का हिस्सा है। मगर भारत ने भी आधिकारिक तौर पर वन चाइना की पॉलिसी को मान्यता दी है।
कहा जाता है कि भाजपा के महासचिव रहते हुए 1999 में नरेंद्र मोदी ताइवान के दौरे पर गए थे। यहीं नहीं 2011 में गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते उन्होंने सबसे बड़े ताइवानी बिजनेस प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया था। जानकारों की मानें तो 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर ताइवान से संबंधों बढ़ाने पर सहमति बनाई।
नेहरू की नीति को राव ने बदला
भारत ने आजादी के तीन साल बाद ताइवान से सभी द्विपक्षीय संबंधों को तोड़ते हुए चीन का साथ चुनते हुए गुटनिरपेक्ष खेमे में चला गया था। इस फैसले से ताइवान और भारत के अनौपचारिक संबंधों में दरार आई गई और ताइवान अमेरिकी नेतृत्व वाले खेमे में शामिल हो गया। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं होने के बावजूद 1990 के बाद नरसिंहा राव की सरकार बदलाव का दौर शुरू हुआ। 1995 में इंडिया-ताइपे एसोसिएशन (आईटीए) का गठन किया हुआ और भारत-ताइवान के बीच कई समझौते हुए।