नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर सत्ता को लेकर संघर्ष की कहानी कोई नई नहीं है और न ही केपी शर्मा ओली के इस्तीफे की मांग कोई नई राजनीतिक घटना है। उनके विरोधी पिछले कई महीनों से इस कोशिश में लगे हैं कि ओली कुर्सी छोड़ें।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) में उनके समकक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड का खेमा लंबे समय से इस मुहिम में लगा हुआ है, लेकिन ओली बेहद संजीदगी के साथ अपनी सियासी पारी खेलते हुए अपने विरोधियों को ये भरोसा दिलाते रहे हैं कि कोविड-19 का ये दौर निकल जाए और हालात जरा सामान्य हो जाएं तो वे खुद ही पद छोड़ देंगे।
लेकिन जैसे जैसे कोरोना काल बढ़ रहा है और इससे फिलहाल निजात मिलती नहीं दिख रही है, विरोधियों ने नए मौके की तलाश तेज कर दी है।
अब विरोधियों के लिए नया मामला चीन की ओर से नेपाली क्षेत्र में किए जा रहे कब्जे को लेकर है। हालांकि उनकी पार्टी भी ये बात अच्छी तरह जानती है कि चीन के कब्जे को लेकर नेपाल के जिस गांव की कहानी इस समय उठाई जा रही है, वह कोई ओली की वजह से नहीं हुआ है।
इसकी कहानी 1962 के बाद से ही शुरू हो जाती है। लेकिन जब से पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में भारत-चीन सीमा विवाद नए सिरे से उठा है, तब नेपाल को भी लगने लगा कि ऐसे वक्त में ओली को इस मुद्दे पर घेरा जा सकता है।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमेटी (स्थाई समिति) की बैठक एक बार फिर हो रही है और जिस तरह बुधवार को उनके ही सहयोगी और पार्टी के अहम नेता प्रचंड ने ओली का इस्तीफा खुलकर मांगा है, उसपर चर्चा भी हो रही है, लेकिन ऐसा पहले भी हो चुका है।
ओली के किडनी ट्रासप्लांट ऑपरेशन के बाद हुई पार्टी की पिछली बैठक में भी पार्टी के कई सदस्यों ने उनसे पद छोड़कर आराम करने की सलाह दी थी। इससे पहले उनपर और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगाए जा चुके हैं।
इन दबावों के मद्देनजर ओली ने बेहद संजीदगी से मान लिया था कि ठीक है, अगर पार्टी चाहती है तो वे इस्तीफा दे देंगे, लेकिन ये वक्त अंदरूनी राजनीति का नहीं है, कोरोना संकट से नेपाल की जनता को बचाने का है, ऐसे में अगर अभी यहां नेतृत्व परिवर्तन होता है तो बाहर और भीतर दोनों ही जगह बहुत खराब संदेश जाएगा।
जाहिर है, पार्टी ने उनका प्रस्ताव मान लिया था।
लेकिन जब से भारत के साथ नेपाल के नए नक्शे को लेकर विवाद बढ़ा है और कृषि मंत्रालय की सर्वे रिपोर्ट में चीन की ओर से 33 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा करने और नदियों की धारा मोड़कर दोनों देशों के बीच प्राकृतिक सीमा बनाने ओर जमीन हड़पने का मामला सामने आया है, साथ ही नेपाली कांग्रेस की ओर से उठाए गए मामले और रुई गांव पर चीनी कब्जे की कहानी सामने आई है ओली पर इस्तीफे का दबाव और बढ़ गया है।
ऐसे में प्रचंड का ये आरोप बेहद गंभीर माना जा रहा है कि ओली सत्ता में बने रहने के लिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मॉडल पर काम कर रहे हैं।
हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स और तमाम आरोपों का खंडन करते हुए नेपाल के विदेश विभाग ने कहा है कि चीन ने किसी गांव पर कब्जा नहीं किया है, जहां तक रुई गांव की बात है, तो वह मामला 1962 से चला आ रहा है।
मंत्रालय का कहना है कि नेपाल और चीन के बीच 5 अक्टूबर, 1961 सीमा संधि के तहत सीमांकन किया गया था और प्रोटोकॉल पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए थे। जिन खंभों के हटाए जाने की बात मीडिया में आ रही है, उसका भी मंत्रालय ने खंडन किया है और कहा है कि वहां कोई खंभा था ही नहीं।
जाहिर है इन तमाम तथ्यों, आरोपों के बीच ओली अपनी कुर्सी बचाए रखने की जंग लड़ रहे हैं और उनका मानना है कि उनपर लगाए जा रहे सारे आरोप बेबुनियाद हैं।
लेकिन पार्टी के भीतरी कतारों और खासकर प्रचंड और माधव कुमार नेपाल जैसे नेताओं के खेमे के जबरदस्त दबाव के बीच ओली इस बात के लिए भी तैयारी कर चुके हैं कि अगर पार्टी उनसे पीएम और पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा मांगती है, तो उन्हें कैसे इस संकट से निपटना है।
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