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Nuclear Energy: गहराते ऊर्जा संकट के बीच एशिया में भी लौट आया परमाणु बिजली का जमाना

Mon, 29 Aug 2022 06:01 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो

सार

Nuclear Energy: फुकुशिमा हादसे के बाद जापान ने एलान किया था कि वह भविष्य में परमाणु ऊर्जा का कोई संयंत्र नहीं लगाएगा। लेकिन अब ये रुख बदल गया है। जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने बीते हफ्ते कहा- यूक्रेन पर हमले ने ऊर्जा की वैश्विक सूरत बदल दी है...
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Nuclear Energy: परमाणु ऊर्जा संयंत्र - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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ऊर्जा संकट गहराने के साथ एशिया में परमाणु बिजली का दौर लौटता दिख रहा है। 2011 में जापान के फुकुशिमा परमाणु प्लांट में हुए भीषण हादसे के बाद कई देशों ने परमाणु बिजली से मुंह मोड़ लिया था। लेकिन अब कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले की बढ़ी महंगाई के बीच इन देशों को परमाणु ऊर्जा में उम्मीद दिखने लगी है।

जापान और दक्षिण कोरिया की सरकारों ने परमाणु ऊर्जा विरोधी नीतियों से हटने की पहल की है। खबरों के मुताबिक भारत और चीन भी अब अधिक संख्या में परमाणु संयंत्र लगाने पर विचार कर रहे हैं। यहां तक कि दक्षिण पूर्व एशिया के कम विकसित देश भी परमाणु तकनीक अपनाने की संभावना पर विचार कर रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद दुनिया भर में पैदा हुआ ऊर्जा संकट नए ट्रेंड का सबसे बड़ा कारण है। वैसे परमाणु ऊर्जा को ग्रीन एनर्जी के रूप में भी देखा जाता है। समझा जाता है कि परमाणु बिजली का इस्तेमाल बढ़ने पर कार्बन गैसों के उत्सर्जन में गिरावट आएगी। थिंक टैंक वर्ल्ड न्यूक्लीयर एसोसिएशन में पॉलिसी एनालिस्ट डेविड हेस ने कहा है- ‘परमाणु ऊर्जा के प्रति हिचक आश्चर्यजनक तेज गति से खत्म हुई है। परमाणु संयंत्र सस्ती बिजली उपलब्ध कराते हैँ। गैस की बढ़ी महंगाई ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया है।’

अखबार जापान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक परमाणु ऊर्जा उद्योग हाल के वर्षों में गहरी मुसीबत में था। सस्ते पेट्रोलियम के कारण परमाणु बिजली को महंगा समझा जाता था। इस वजह से परमाणु परियोजनाओं को पूरा करने में देर हुई। नतीजा वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक जैसी इस क्षेत्र की बड़ी कंपनी के दिवालिया हो जाने के रूप में सामने आया।

अब राय बनी है कि दुनियाभर में परमाणु ऊर्जा का दौर लौट आया है। ब्रिटेन से लेकर जर्मनी तक में नए परमाणु संयंत्र लगाने पर विचार किया जा रहा है। एशिया भी इसमें पीछे नहीं है। ऑस्ट्रेलिया की यूरेनियम कंपनी बैनरमैन एनर्जी लिमिटेड के सीईओ ब्रैंडन मुनरो ने कहा है- ‘फुकुशिमा हादसे के बाद भय के कारण परमाणु ऊर्जा के प्रति एतराज बढ़ा था। लेकिन अब एशियाई देशों के सामने सवाल ऊर्जा स्रोतों के अभाव का है।’

फुकुशिमा हादसे के बाद जापान ने एलान किया था कि वह भविष्य में परमाणु ऊर्जा का कोई संयंत्र नहीं लगाएगा। लेकिन अब ये रुख बदल गया है। जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने बीते हफ्ते कहा- ‘यूक्रेन पर हमले ने ऊर्जा की वैश्विक सूरत बदल दी है। अब परमाणु ऊर्जा और अन्य अक्षय ऊर्जा स्रोतों की तरफ जाना जरूरी माना जा रहा है।’ जापान के अखबार योमिरी में छपी एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक जापान का जनमत भी अब परमाणु ऊर्जा के पक्ष में होता जा रहा है। इस सर्वे में शामिल 58 फीसदी लोगों ने परमाणु ऊर्जा की तरफ लौटने का समर्थन किया।

ऐसा ही ट्रेंड दक्षिण कोरिया में भी दिखा है। इसी वर्ष वहां के मतदाताओं ने ऐसे नेता को राष्ट्रपति चुना, जिन्होंने देश की कुल ऊर्जा जरूरत का 30 फीसदी परमाणु संयंत्रों से पूरा करने की योजना को अपने चुनाव घोषणा पत्र में शामिल किया था। इस समय असाधारण गर्मी और गर्म हवाओं से झुलस रहे चीन ने भी कहा है कि अब वह परमाणु ऊर्जा और पनबिजली परियोजनाओं पर अमल की गति तेज करेगा।

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