डोनाल्ड ट्रंप ने आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच 'शांति संधि' पर हस्ताक्षर कराए। इसके बाद दोनों देशों के नेताओं ने नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति के नामांकन का समर्थन किया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग एक बार फिर उठी है। पाकिस्तान और इस्राइल के बाद अब अजरबैजान और आर्मेनिया ने नोबेल शांति पुरस्कार के नामांकन के लिए ट्रंप का समर्थन किया है। इससे पहले ट्रंप ने आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच 'शांति संधि' पर हस्ताक्षर कराए।
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अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिनयान ने कहा कि ट्रंप की मध्यस्थता के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिलना चाहिए। इससे पहले पाकिस्तान और इस्राइल ने ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन का समर्थन किया था।
दुनिया में शांति और स्थिरता लाने की चाहत
एशियाई मुल्क आर्मेनिया और कॉकेशस के पास बसे देश अजरबैजान के बीच 'शांति संधि' पर हस्ताक्षर कराने के दौरान ट्रंप ने कहा कि राष्ट्रपति के रूप में, मेरी सर्वोच्च आकांक्षा दुनिया में शांति और स्थिरता लाना है। दोनों पूर्व सोवियत गणराज्य हमेशा के लिए लड़ाई बंद करने, वाणिज्य, यात्रा और राजनयिक संबंधों को खोलने, एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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चार दशकों का तनाव होगा खत्म
आर्मेनिया और अजरबैजान में चार दशकों से हिंसा और लड़ाई जारी थी और यह लड़ाई काराबाख क्षेत्र पर कब्जे को लेकर थी। दरअसल सोवियत संघ के समय में काराबाख क्षेत्र अजरबैजान का हिस्सा था, लेकिन यहां आर्मेनियाई आबादी रहती थी और इस इलाके को स्वायतत्ता प्राप्त थी। आर्मेनिया ईसाई और अजरबैजान मुस्लिम बहुल देश हैं। मुस्लिम ओटोमन साम्राज्य के समय में यहां बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ और इतिहास के अनुसार, करीब 15 लाख आर्मेनियाई लोगों को मौत के घाट उतारा गया। इसे लेकर साल 1988 में काराबाख इलाके में रहने वाले आर्मेनियाई लोगों ने बगावत कर दी और आर्मेनिया के साथ मिलने का एलान कर दिया।
सोवियत संघ के बिखराव के बाद जब आर्मेनिया आजाद हुआ तो आर्मेनिया और अजरबैजान में काराबाख इलाके के लिए लड़ाई हुई। इस लड़ाई में करीब 30 हजार लोग मारे गए और 10 लाख से ज्यादा लोगों के विस्थापित होने का अनुमान है। साल 1994 में दोनों पक्षों में युद्धविराम हुआ, तब तक आर्मेनियाई लोगों ने काराबाख इलाके पर कब्जा कर लिया था। कई दशकों तक दोनों पक्षों में मध्यस्थता की कोशिश हुई, लेकिन जब ये कोशिश नाकाम हुई तो सितंबर 2020 में अजरबैजान ने फिर से काराबाख पर हमला कर दिया और इस बार उसका साथ दिया तुर्किए ने। करीब छह हफ्ते की लड़ाई के बाद अजरबैजान ने काराबाख पर कब्जा कर लिया और यहां रहने वाले आर्मेनियाई लोगों को यहां से भागना पड़ा।