नेपाल की सरकार अपने एक अहम फैसले को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। कैबिनेट की बैठक में यह सहमति बनी कि मेडिकल उपकरणों की खरीद का सौदा निजी हाथों से लेकर नेपाली सेना को दे दिया जाए। यह खबर फैलते ही विपक्ष समेत सत्ताधारी पार्टी के भी कई नेता नेपाल सरकार के खिलाफ बयान देने लगे। कैबिनेट की बैठक में स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह फैसला किया कि यह डील बगैर किसी तीसरी पार्टी के सीधे सरकार से सरकार के बीच हो और यह ज़िम्मेदारी नेपाली सेना को ही दे दी जाए।
नेपाल की समाजवादी पार्टी के नेता बाबूराम भट्टाराई ने सरकार के इस फैसले पर संदेह जताते हुए सवाल उठाया कि क्या गोली और बंदूक किसी वायरस को खत्म कर सकती है? सरकार ने आखिर सेना को ऐसे वक्त में मेडिकल सामानों की डील का यह काम क्यों सौंपा है? क्या सरकार से सरकार की सीधे डील करने की प्रक्रिया पहले नहीं हो सकती थी?
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता कमल थापा ने भी भट्टाराई का समर्थन करते हुए कहा कि सेना को इस डील के लिए राजी नहीं होना चाहिए क्योंकि उसे इस तरह के कामों में लगाने का कोई मतलब नहीं है। उसके पास दूसरी अहम ज़िम्मेदारियां हैं और अगर वह नागरिकों की सामान्य जरूरत के सामानों की डील करने लग जाए तो देश की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा जैसी अपनी मुख्य जिम्मेदारियां कैसे निभाएगी।
सत्ताधारी पार्टी की नेता रामकुमारी झाकरी और विष्णु रिजाल ने भी सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा और सवाल उठाया कि क्या हमारे देश की बाकी संस्थाएं अपनी विश्वसनीयता खो चुकी हैं।
जाहिर है, ऐसे वक्त में जब नेपाल की सत्ताधारी पार्टी समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हैं, नेपाल सरकार का ये फैसला सेना को और ज्यादा अधिकार देकर कहीं न कहीं सवाल तो खड़े करता ही है। साथ ही नेपाल की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी इसके दूरगामी नतीजे दिखने की आशंका जताई जा रही है। सरकार ने पहले ही नेपाली सेना को फास्ट ट्रैक और कई बड़ी परियोजनाओं के काम में भी लगा रखा है।
इससे विपक्ष को आशंका हो रही है कि सेना को ज्यादा से ज्यादा अधिकार देकर सरकार कहीं नेपाल में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे हालात न पैदा कर दें, जहां सत्ता पर एक तरह से सेना का ही कब्जा रहा है।