अमेरिका के स्टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम (एसपीपी) के जंजाल से नेपाल सरकार अभी तक बाहर नहीं निकल पाई है। देश में तीखे विवाद के बाद बीते सोमवार को सरकार ने फैसला किया था कि नेपाली सेना एसपीपी में शामिल होने के लिए अब और आगे कदम नहीं बढ़ाएगी। लेकिन अब सवाल ये उठा खड़ा हुआ है कि ऐसा कैसे किया जाए। नेपाल के विदेश मंत्रालय को एसपीपी से बाहर निकलने संबंधी फैसले का पत्र गुरुवार को प्राप्त हुआ। अब विदेश मंत्रालय को ये तय करना है कि इस निर्णय के अनुरूप वह कैसे कदम उठाए।
बीते सोमवार को मंत्रिमंडल ने यह फैसला भी लिया था कि आगे से दूसरे देशों की सरकारों से सारा पत्राचार सिर्फ विदेश मंत्रालय करेगा। इसलिए एसपीपी मामले में अमेरिका को कैबिनेट का फैसला बताने की जिम्मेदारी अब विदेश मंत्रालय पर आ गई है। इस बीच काठमांडू के राजनीतिक हलकों में ये चर्चा तेज हो गई है कि कैबिनेट के इस फैसले से अमेरिका नाराज है। काठमांडू स्थित अमेरिकी राजनयिकों ने इस बारे में अपनी नाराजगी नेपाल सरकार को बताई है। कुछ खबरों में कहा जा रहा है कि इस नाराजगी के कारण नेपाल का विदेश मंत्रालय असमंजस में है। इसी वजह से कैबिनेट का फैसला बताने के लिए अमेरिका को पत्र लिखने में देर हो रही है।
पिछले दिनों ये खबर लीक हुई थी कि अमेरिका नेपाल की सेना पर उसके नेशनल गार्ड के साथ एसपीपी में शामिल होने के लिए दबाव डाल रहा है। इसको लेकर नेपाल में जोरदार विवाद खड़ा हो गया। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने नेपाल के अमेरिका के साथ किसी सैनिक गठबंधऩ में शामिल होने का विरोध किया। उसके बाद ही नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने एसपीपी में शामिल ना होने का निर्णय लिया।
गुरुवार को चीन ने इस फैसले का स्वागत किया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि चीन नेपाल की गुटनिरपेक्ष नीति का हमेशा समर्थन करता रहेगा। प्रवक्ता ने कहा- ‘नेपाल के विभिन्न राजनीतिक दलों और समूहों, सरकार, सेना, और नेपाली समाज ने एसपीपी को एक सैनिक और सुरक्षा पहल के रूप में देखा है, जिसका संबंध अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति से है। वहां ये राय बनी है कि इसमें शामिल होना नेपाल के राष्ट्रीय हित, लंबे समय से अपनाई गई गुटनिरपेक्षता की नीति, और संतुलित विदेश नीति के खिलाफ है।’