काठमांडू में सोमवार को नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने कहा कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, जैवविविधता की हानि और वायु प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन संकटों से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग ही एकमात्र रास्ता है। राष्ट्रपति पौडेल ने दो दिवसीय हिंदू कुश हिमालय सांसद सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए इसे भविष्य के लिए मजबूत रोडमैप और साझा प्रतिबद्धता की शुरुआत बताया।
इस उच्चस्तरीय सम्मेलन में अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक फैले 3,500 किलोमीटर लंबे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के करीब 200 प्रतिनिधि जुटे। इनमें सांसद, नीति निर्माता, पर्यावरण वैज्ञानिक, जलवायु विशेषज्ञ और मीडिया प्रतिनिधि शामिल थे। उद्देश्य था आपसी सहयोग से जलवायु संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों का हल निकालना। राष्ट्रपति पौडेल ने कहा कि सांसदों का सहयोग, दूरदर्शिता और एकजुटता इन संकटों से निपटने के लिए बेहद जरूरी है।
सीमापार खतरों पर चिंता
अंतरराष्ट्रीय संस्था आईसीआईएमओडी के महानिदेशक पेमा ग्यात्सो ने बताया कि हिंदू कुश हिमालय बहु-खतरों का केंद्र बनता जा रहा है। यहां भौगोलिक, जलविज्ञानी और जलवायु संबंधी जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि पहाड़ी पारिस्थितिक तंत्र वैश्विक स्तर पर कम प्रतिनिधित्व पाते हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीतियां और योजनाएं अक्सर इन क्षेत्रों की चुनौतियों को नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे इनके संरक्षण और विकास पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
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सहयोग पर जोर
संसद की कृषि, सहकारिता और प्राकृतिक संसाधन समिति की अध्यक्ष कुसुम देवी थापा ने कहा कि इस संकट से निपटने के लिए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का सहयोग जरूरी है। इसके साथ ही मीडिया, वैज्ञानिक समुदाय और विकास भागीदारों की भूमिका भी अहम है। नेपाल के विदेश मंत्री अर्जुना राणा देउबा, पर्यावरण मंत्री ऐन बहादुर शाही ठाकुरी और सांसद बीर बहादुर बलायर ने भी क्षेत्रीय सहयोग और उच्च राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता पर बल दिया।
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चर्चाएं और नतीजे
बैठक में तीन पैनल चर्चाएं हुईं जैवविविधता संरक्षण, हिंदू कुश हिमालय का भविष्य और जलवायु आपदाओं से निपटने में सांसदों की भूमिका। विशेषज्ञों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव केवल आपदाओं तक सीमित नहीं हैं। इससे जैवविविधता खत्म हो रही है, पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर हो रहा है, पानी की कमी बढ़ रही है और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में रहने वाले समुदायों पर सामाजिक-आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।