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Nepal Politics: नेपाल में फिर से ताजा हो गईं माओवादी विद्रोह के समय की भयानक यादें!

Thu, 09 Mar 2023 03:17 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडो

सार

पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस घटनाक्रम ने तीन दशक पहले की भयानक यादों को ताजा कर दिया है, जब नेपाल में माओवादी हिंसा रोजमर्रा की बात थी। 2006 के समझौते के तहत उस विद्रोह से जुड़े ज्यादातर नेता और समूहों ने भूमिगत लड़ाई का रास्ता छोड़ दिया...
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Nepal Politics: Pushpa Kamal Dahal - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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नेपाल में माओवादी विद्रोह के जमाने में हुई हत्याओं के मामलों के फिर से खुलने की आशंका से उस विद्रोह से जुड़े रहे गुट भयभीत हैं। पिछले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट दो वकीलों की याचिकाओं को विचार के लिए स्वीकार कर लिया था, जिनमें राजतंत्र के समय हुई हजारों हत्याओं के लिए प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल को जिम्मेदार ठहराने की अपील की गई है। एक याचिका में ऐसी पांच हजार और दूसरी में 17 हजार हत्याओं के लिए उन्हें दोषी ठहराने की बात शामिल है। बीते सोमवार को नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दलों ने इस मामले में प्रधानमंत्री को अपना समर्थन दिया था।

उसके एक दिन बाद आठ अलग-अलग माओवादी गुटों की प्रधानमंत्री निवास पर बैठक हुई। इस बैठक को इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण माना गया है कि इन गुटों के बीच आपसी रिश्ते कड़वाहट भरे रहे हैं। ये गुट एक दूसरे पर माओवाद के रास्ते भटक जाने के इल्जाम लगाते रहे हैं। खास पर ये प्रधानमंत्री दहल के आलोचक रहे हैं।

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक इन गुटों ने प्रधानमंत्री आवास पर हुई बैठक के दौरान चेतावनी दी कि अगर न्यायपालिका ने ‘शांति प्रक्रिया’ के खिलाफ रुख अपनाया, तो वे उसका पुरजोर विरोध करेंगे। नेपाल में ‘शांति प्रक्रिया’ से मतलब राजतंत्र के खात्मे के बाद बनी सहमति से है, जिसके तहत माओवादी गुटों ने हथियारबंद लड़ाई का रास्ता छोड़ दिया था। तभी सहमति बनी थी कि माओवादी विद्रोह के दौरान हुई हिंसा और हत्या के मामलों को सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से अलग हट कर निपटाया जाएगा। इन पर विचार के लिए अपनाए गए रास्ते को संक्रमणकालीन प्रक्रिया के नाम से जाना जाता है।

आठों गुटों के नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर ‘शांति प्रक्रिया’ को पटरी से उतारने की कोशिश की गई, न सिर्फ वे गुट, बल्कि आम जन भी सड़कों पर उतर कर विरोध जताएंगे। बैठक में शामिल हुए गुट कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (बहुमत) के नेता धर्मेंद्र बस्तोला ने पत्रकारों से कहा- ‘हम किसी भी सूरत के लिए तैयार हैं।’

प्रधानमंत्री निवास पर हुई बैठक के बाद वहां मौजूद दलों की तरफ से एक साझा बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया कि शांति प्रक्रिया को 2006 के ‘व्यापक शांति समझौते’ की भावना के मुताबिक आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इस बयान पर दहल की पार्टी सीपीएन (माओइस्ट सेंटर) ने भी दस्तखत किए। इसे एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया है।

दहल के अलावा इस बयान पर पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल समाजवादी पार्टी के नेता बाबूराम भट्टराई, सीपीएन (रिवोल्यूशनरी माओइस्ट) के सीपी गजुरेल, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के खड़गा बहादुर विश्वकर्मा, सीपीएन (बहुमत) के धर्मेंद्र बस्तोला, वैज्ञानिक समाजवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विश्वभक्त दुलाल ‘आहूति’, सीपीएन (माओइस्ट सोशलिस्ट) के कर्णजीत बुधथोटी, और माओइस्ट कम्युनिस्ट पार्ट ऑफ नेपाल के नारायण प्रसाद धीमल ने भी दस्तखत किए हैं।  

पर्यवेक्षकों के मुताबिक इस घटनाक्रम ने तीन दशक पहले की भयानक यादों को ताजा कर दिया है, जब नेपाल में माओवादी हिंसा रोजमर्रा की बात थी। 2006 के समझौते के तहत उस विद्रोह से जुड़े ज्यादातर नेता और समूहों ने भूमिगत लड़ाई का रास्ता छोड़ दिया। उसके बाद से इन गुटों में गहरे मतभेद रहे हैं। लेकिन ताजा घटनाक्रम में उनमें एकजुटता की बात भी होने लगी है।

सीपीएन (माओइस्ट रिवोल्यूशनरी) के नेता सीपी गजुरेल ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा- ‘दहल के नेतृत्व वाली जैसी पार्टियों से एकता की संभावना तो नहीं है, लेकिन संक्रमणकालीन न्याय के मुद्दे पर हम एकजुट हैं। निश्चित रूप से सभी माओवादी गुटों में एक कामकाजी गठबंधन बनाया जाएगा, ताकि शांति प्रक्रिया के खिलाफ रची गई साजिश का मुकाबला किया जा सके।’

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