नेपाल ने भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे से आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर रविवार को आपत्ति जताई है। नेपाल का दावा है कि यह इलाका काठमांडू के अधिकार क्षेत्र में आता है। सरकार ने कहा है कि उसने इस संबंध में अपनी स्थिति भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक माध्यमों से अवगत करा दिया है। कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल की यह आपत्ति भारत द्वारा यात्रा के जून और अगस्त के बीच आयोजित होने की घोषणा के कुछ दिनों बाद आई है।
नेपाली भूमि लिपुलेक हुँदै कैलाश मानसरोवर यात्राका विषयमा मिडियाबाट सोधिएका प्रश्नका सम्बन्धमा परराष्ट्र प्रवक्ताको जवाफ
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इस बीच, कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 का कार्यक्रम जारी कर दिया गया है। इस वर्ष भी यात्रा उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथुला दर्रे के रास्ते संचालित होगी। दोनों मार्गों से 10-10 जत्थों में कुल 1000 श्रद्धालु यात्रा करेंगे, जिनमें लिपुलेख मार्ग से 500 यात्री शामिल होंगे। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से संचालित होने वाली इस यात्रा का पहला जत्था 4 जुलाई को दिल्ली से रवाना होगा। यात्रियों को 30 जून से 3 जुलाई के बीच दिल्ली में मेडिकल जांच, दस्तावेज सत्यापन और आवश्यक ब्रीफिंग पूरी करनी होगी। इस वर्ष यात्रा में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी किया गया है। अब अधिकांश यात्रा सड़क मार्ग से होगी। पहले जहां श्रद्धालुओं को 60 किलोमीटर से अधिक पैदल चलना पड़ता था, अब यह दूरी घटकर करीब 38 किलोमीटर रह गई है। कुल यात्रा लगभग 1738 किलोमीटर की होगी, जिसमें अधिकतर दूरी वाहनों से तय की जाएगी।
मानचित्र विवाद
गौरतलब है कि मई 2020 में नेपाल की केपी ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने कालापानी और लिपुलेख सहित इन क्षेत्रों को अपने आधिकारिक मानचित्र में शामिल कर लिया था। यह कदम भारत द्वारा धारचूला को तिब्बत में कैलाश मानसरोवर तीर्थस्थल तक ले जाने वाले 80 किलोमीटर लंबे मार्ग का उद्घाटन करने के बाद उठाया गया था। नेपाल ने इस सड़क के उद्घाटन को भारत का एकतरफा कार्य बताते हुए विरोध किया था।
विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को घोषणा की थी कि वार्षिक कैलाश मानसरोवर यात्रा इस वर्ष जून से अगस्त के बीच दो मार्गों - उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रा और सिक्किम में नाथुला दर्रा - से आयोजित की जाएगी। चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित माउंट कैलाश और मानसरोवर झील की तीर्थयात्रा हिंदुओं, जैनों और बौद्धों के लिए धार्मिक महत्व रखती है। भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के तहत, यह यात्रा लगभग पांच साल के अंतराल के बाद पिछले साल फिर से शुरू हुई थी।
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भारत और नेपाल के बीच सीमा निर्धारण 1816 में अंग्रेजों और गोरखा शासक के बीच हुए सुगौली समझौते के आधार पर हुआ था। इस समझौते के तहत काली नदी को दोनों देशों की सीमा माना गया। काली या महाकाली नदी का उद्गम क्षेत्र हिमालय की घाटियों में स्थित है, जो भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं के पास पड़ता है। कालापानी क्षेत्र इसी इलाके में स्थित है और यहीं लिपुलेख दर्रा भी है। इसके उत्तर-पश्चिम में कुछ दूरी पर लिम्पियाधुरा दर्रा स्थित है। सुगौली संधि के अनुसार काली नदी के पश्चिम का क्षेत्र भारत और पूर्व का क्षेत्र नेपाल के हिस्से में माना गया था। हालांकि, काली नदी के वास्तविक उद्गम को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद बना हुआ है। भारत पूर्वी धारा को नदी का उद्गम मानता है, जबकि नेपाल पश्चिमी धारा को इसका स्रोत मानता है। इसी आधार पर दोनों देश कालापानी क्षेत्र पर अपना-अपना दावा करते हैं।
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