नेपाल दोहरी मुसीबत में फंसा हुआ है। जिस समय कोरोना संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है, देश राजनीतिक अस्थिरता में भी उलझा हुआ है। वैसे तो राजनीतिक अस्थिरता का दौर खासा लंबा हो चुका है, लेकिन बीते सोमवार को संसद के निचले सदन में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विश्वासमत हार जाने के बाद से एक तरह से देश में कोई पूर्ण अधिकार प्राप्त सरकार नहीं है।
तीन करोड़ 10 लाख आबादी वाले इस देश में एक महीना पहले तक कोरोना संक्रमण के रोज लगभग 100 मामले सामने आ रहे थे। जबकि इस मंगलवार को यहां 9,483 नए मामले सामने आए। जब से कोरोना महामारी आई है, किसी एक दिन में लोगों के संक्रमित होने की यह सबसे बड़ी संख्या है। इस मंगलवार को 225 लोगों की कोरोना संक्रमण के कारण जान गई।
नेपाली मीडिया का एक हिस्सा कोरोना महामारी की ताजा लहर के लिए भारत को दोषी ठहरा रहा है। कहा जा रहा है कि भारत में आई दूसरी लहर और वहां वायरस के म्यूटेट हुए संस्करण दोनों देशों के बीच खुली सीमा के कारण नेपाल पहुंच गए। अब देश में हालत काबू से बाहर दिखती है। अस्पतालों के बाहर मरीजों की लंबी कतार है। कई अस्पतालों में ऑक्सीजन ना होने के कारण मरीजों को लौटाया जा रहा है। अंत्येष्टि स्थलों पर भी सामान्य से अधिक शव पहुंचने लगे हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि भले भारत दूसरी लहर का स्रोत बना हो, लेकिन नेपाल में जो मुसीबत पैदा हुई है, उसके लिए नेपाल सरकार ही जिम्मेदार है। उनके मुताबिक जब भारत में दूसरी लहर फैल रही थी, नेपाल सरकार सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। केपी शर्मा ओली अपनी सरकार बचाने की जोड़-तोड़ में जुटे रहे। संसद में उनके विरोधी भी महामारी की दूसरी लहर की तरफ ध्यान खींचने के बजाय अपने समीकरण मजबूत करने में जुटे रहे। महामारी के बीच ओली सरकार को सदन में विश्वास मत हासिल करने को कहा गया।
ओली विश्वास मत हासिल करने में नाकाम रहे। 275 सदस्यों के सदन में विश्वास मत प्राप्त करने के लिए उन्हें 136 वोटों की जरूरत थी, लेकिन उनके पक्ष में महज 93 वोट पड़े। 124 सदस्यों ने उनके खिलाफ वोट दिया। इससे ये संकेत मिला कि ओली विरोधियों के पास भी नई सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं है। लेकिन नए हालात के बीच राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी है। इससे देश के राजनेताओं और प्रशासन का ध्यान सियासी उठापटक में लगा हुआ है। इसका असर कोरोना महामारी पर काबू पाने की कोशिशों पर पड़ा है।
नेपाल में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी अप्रैल के आरंभ में ही होने लगी थी। आठ अप्रैल को एक दिन पहले की तुलना में तीन गुना ज्यादा मामले सामने आए थे। उसके बाद ये सिलसिला जारी रहा। लेकिन उसे सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। भीड़-भाड़ वाले धार्मिक आयोजनों, विवाह बड़ी पार्टियों और दूसरे सार्वजनिक उत्सवों को मंजूरी देना जारी रखा गया। 29 अप्रैल को जब संक्रमण के 4,800 से ज्यादा मामले सामने आए, तब जाकर काठमांडू में दो हफ्तों का लॉकडाउन लागू किया गया। अब इसे 27 मई तक बढ़ा जा चुका है। मई आने के बाद भारत से लगी सीमा और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को बंद किया गया। तभी विदेशों से ऑक्सीजन मंगवाने के ऑर्डर जारी किए गए।
आरोप है कि ओली और उनकी सरकार ने महामारी से निपटने को लेकर अंतर्विरोधी संदेश दिए हैं। उन्होंने समस्या को कम करके बताने की कोशिश की है। आठ मई को अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में ओली ने दावा किया कि नेपाल में हालत काबू में है। जब उनसे देश में हाल के हफ्तों में बड़े आयोजनों को इजाजत देने के बारे में पूछा गया, तब उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ गलतियां हुई हैं। लेकिन साथ ही उन्होंन कहा कि इन बातों को सियासी मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।
लेकिन हालत काबू में होने के ओली के दावे पर देश में गुस्सा देखा गया है। स्वयंसेवी संस्था- कोविड कनेक्ट नेपाल के कार्यकर्ता सूरज राज पांडेय ने सीएनएन से कहा कि ओली अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने गलत तस्वीर पेश करना चाहते हैँ। उन्होंने कहा- ‘यहां नेपाल में हाल यह है कि लोगों को अस्पतालों में बिस्तर और ऑक्सीजन नहीं मिल रहा है। वे मदद के लिए चिल्ला रहे हैं। लेकिन देश के प्रधानमंत्री दुनिया को बता रहे हैं कि यहां सब ठीक है।’